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Alwar Kalakand Story: 1947 में गलती से बने दूध से शुरू हुआ सफर, विदेशों में मिल्क केक की बढ़ी डिमांड

दिवाली के मौके पर अलवर के मिल्क केक को लोग खूब पसंद करते है. इसका दानेदार स्वाद इसको सबसे अलग बनाता है. दूध, चीनी और केसर से तैयार होने वाला मिल्ककेक देश के अलावा विदेश में भी सप्लाई होता है. मिल्क केक के साथ ड्राई फ्रूट्स की मिठाइयों की भी डिमांड तेजी से बढ़ने लगी है. दूध व मावे में होने वाली मिलावट से बचने के लिए लोग ड्राई फ्रूट से बनी हुई मिठाइयों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं.

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मिल्क केक की बढ़ी डिमांड मिल्क केक की बढ़ी डिमांड

दिवाली के त्योहार पर मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है. इस मौके पर अलवर का मिल्क केक यानी कलाकंद लोगों की खास पसंद बना रहता है. इसका दानेदार स्वाद और अलग बनावट इसे दूसरी मिठाइयों से खास बनाती है. दूध, चीनी और केसर से तैयार होने वाला यह मिल्क केक देश के अलगhअलग हिस्सों के साथ विदेशों में भी सप्लाई किया जाता है. यूरोप, अमेरिका, सऊदी अरब, कनाडा, नेपाल और भूटान तक इसका स्वाद पहुंच रहा है. इसके साथ ही ड्राई फ्रूट्स से बनी मिठाइयों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है.

दानेदार स्वाद के लिए मशहूर है अलवर का कलाकंद
त्योहार के समय बाजार में कई तरह की मिठाइयां उपलब्ध रहती हैं, लेकिन अलवर के कलाकंद की अपनी अलग पहचान है. यह बाहर से भूरा और अंदर से मलाईदार व मीठा होता है. इसका दानेदार स्वाद ही इसे खास बनाता है. अलवर का कलाकंद देशभर में पसंद किया जाता है और विदेशों में भी इसकी सप्लाई होती है. कलाकंद बनाने के लिए 2 लीटर दूध में ढाई सौ ग्राम चीनी, तीन से चार चम्मच घी, नींबू का रस और इलायची पाउडर मिलाया जाता है. इसमें ड्राई फ्रूट्स भी डाले जाते हैं. दूध को उबालकर लगातार पकाया जाता है, जिसके बाद उसे फाड़कर दाने तैयार किए जाते हैं.

इस तरह तैयार होता है कलाकंद
कलाकंद व्यापारी आशीष तनेजा के मुताबिक, सबसे पहले दूध को लोहे या स्टील की कढ़ाई में लगातार उबाला जाता है. इसके बाद उसमें नींबू का रस या फिटकरी डालकर दूध को फाड़ा जाता है. इससे दूध में हल्के दाने बनने लगते हैं. फिर इसमें चीनी डालकर अच्छी तरह पकाया जाता है. जब मिश्रण गाढ़ा हो जाता है, तो उसे एक सांचे में डालकर जमा दिया जाता है. इसी प्रक्रिया से कलाकंद तैयार होता है. दूध, चीनी और दूसरी चीजों के मेल से इसका खास स्वाद बनती है.

1947 में हुई थी अलवर के मिल्क केक की शुरुआत
अलवर में मिल्क केक बनाने की शुरुआत साल 1947 में हुई थी. बताया जाता है कि पाकिस्तान से विस्थापित होकर अलवर पहुंचे बाबा ठाकुरदास एक दिन दूध गर्म कर रहे थे. इसी दौरान दूध फट गया. उन्होंने उसमें चीनी मिलाकर पकाया और फिर एक बर्तन में जमा दिया. ठंडा होने पर मिठाई अंदर से हल्की लाल हो गई. बाद में इसे कलाकंद नाम दिया गया. आज बाबा ठाकुरदास की तीसरी पीढ़ी इस मिल्क केक को बना रही है. सरस डेयरी के अलावा अलवर और आसपास के क्षेत्रों में सैकड़ों दुकानदार भी मिल्क केक तैयार करते हैं. अलवर आने वाले नेता, अभिनेता और कारोबारी भी इसे खाते हैं और पसंद करते हैं.

मिल्क केक के साथ बाजार में ड्राई फ्रूट्स से बनी मिठाइयों की मांग भी बढ़ रही है. दूध और मावे में मिलावट की आशंका से बचने के लिए लोग ड्राई फ्रूट्स से तैयार मिठाइयों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. दिवाली के मौके पर इनकी मांग में तेजी देखने को मिल रही है.
 

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