गुजरात का जलमग्न खोज अभियान
गुजरात का जलमग्न खोज अभियान
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के जलमग्न पुरातत्व विभाग द्वारा देवभूमि द्वारका जिले के बेट द्वारका द्वीप पर एक महत्वपूर्ण जलमग्न खोज अभियान चलाया गया है. इस खोज में समुद्र तल से एक प्राचीन बंदरगाह और सुनियोजित शहर के चौंकाने वाले प्रमाण मिले हैं. ओखामंडल समुद्र तल में यह विशाल अभियान दिसंबर 2025 में शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य प्राचीन बस्तियों की संरचना, सांस्कृतिक विकास और हजारों वर्षों की समुद्री गतिविधियों को वैज्ञानिक रूप से समझना है. हालांकि, हाल ही में प्राचीन साक्ष्यों की खोज से ओखामंडल के गौरवशाली इतिहास पर नई रोशनी पड़ी है.
प्राचीन साहित्य में उल्लेख
बेट द्वारका का उल्लेख प्राचीन साहित्य में भी मिलता है. बेट द्वारका सदियों से तटीय बस्तियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र रहा है. प्राचीन साहित्य में इस द्वीप को 'अंतदीप' के नाम से जाना जाता है, जबकि ग्रीक ग्रंथ 'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी' में इसे 'बराका' के रूप में उल्लेख किया गया है. दक्षिण-पूर्वी तट पर पहले की गई जांचों में मिट्टी के बर्तनों और सीपियों के अवशेषों से मानव बस्ती के प्रमाण मिले थे.
समुद्र तल में मिला व्यवस्थित प्रचिन शहर
समुद्र तल में एक सुनियोजित शहर मिला है. एएसआई द्वारा बेट द्वारका के समुद्र तट पर औपचारिक रूप से लगभग 20 खाइयां खोदी गईं, जिनमें विशाल संरचनाएं सामने आई हैं. इससे पहले ASI और अन्य संस्थानों द्वारा द्वीप के चुनिंदा क्षेत्रों में किए गए अन्वेषणों और सीमित खुदाई से संरचनात्मक अवशेष, मिट्टी के बर्तन, पत्थर के लंगर और अन्य सांस्कृतिक सामग्री प्राप्त हुई थी, जो प्रागैतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक चरण तक मानवीय गतिविधियों की निरंतरता को दर्शाती है.
खुदाई की चुनौतियां और मौजूदा कार्य
वर्तमान खुदाई बेट द्वारका में समुद्र तट के पास की जा रही है. यह क्षेत्र घनी वनस्पति (जिसमें कीकर के पेड़ और कैक्टस शामिल हैं) और वन्यजीवों की उपस्थिति के लिए जाना जाता है, जिससे खुदाई का काम विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है. चल रही खुदाई में पत्थर की संरचनाओं के अवशेष सामने आए हैं.
मिले महत्वपूर्ण पुरावशेष
खुदाई के दौरान प्राप्त पुरावशेषों में विदेशी मिट्टी के बर्तन, कांच के मोती, शंख की चूड़ियां, सिक्के और लोहे की वस्तुएं शामिल हैं, जो इस क्षेत्र के सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं. इस स्थल का पुरातात्विक महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि कई स्थानों पर संरचनात्मक अवशेष देखे गए हैं.
BSD क्षेत्रों की पहचान
बेट द्वारका के दक्षिण-पूर्वी तट पर पहले किए गए क्षेत्रीय अन्वेषणों के दौरान, पुरातात्विक अवशेषों वाले चार क्षेत्रों की पहचान की गई थी. उन्हें BSD-1 से BSD-4 के रूप में नामित किया गया है. इन क्षेत्रों से मिट्टी के बर्तनों, शंख के टुकड़ों (debitage), शंख के केंद्रीय स्तंभ (columella) और पत्थर की संरचनात्मक विशेषताओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो यहां मानवीय बस्ती के होने के राज को दर्शा रहा है.
समुद्र के नीचे संरचनाओं की खोज
समुद्री पुरातत्व दल ने भी विभिन्न संरचनाएं खोजी हैं. समुद्र के नीचे खुले गलियारों, गलियों जैसी संरचनाओं और कई कमरों वाली एक सुव्यवस्थित संरचना मिली है. इस संरचना के चारों ओर सुरक्षा व्यवस्था देखी गई है, जो दर्शाती है कि यह एक प्राचीन किला है. विशेषज्ञों के अनुसार, ये संरचनाएं न केवल आवासीय उद्देश्यों के लिए थीं, बल्कि इनका उपयोग व्यापार और माल के भंडारण जैसे कई उद्देश्यों के लिए किया जाता था.
रोमन साम्राज्य से व्यापार के प्रमाण
रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं. इस स्थल पर न केवल निर्माण कार्य, बल्कि बड़ी मात्रा में वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियां भी पाई गई हैं. विदेशी व्यापार को प्रमाणित करने वाले महत्वपूर्ण अवशेषों की बात करें तो खोज अभियान के दौरान रोमन उत्कीर्णन, रोमन सिक्कों की छाप, रोमन एम्फ़ोरा विशेष जार और टॉरपीडो जार के अवशेष मिले हैं.
प्राचीन औद्योगिक गतिविधियां
इसके अलावा, इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि यहां मनके बनाने और तांबा-लोहा गलाने जैसी औद्योगिक गतिविधियां फल-फूल रही थीं. इससे पता चलता है कि हजारों साल पहले बेट द्वारका के रोमन सभ्यता के साथ सीधे व्यापारिक संबंध थे और यहां से धातुओं का उत्पादन, आयात और निर्यात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता था.
(रिपोर्ट- ब्रिजेश दोषी)
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