Nitish Kumar
Nitish Kumar
'मैं आपको पूरी ईमानदारी से विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपके साथ मेरा यह संबंध भविष्य में भी बना रहेगा एवं आपके साथ मिलकर एक विकसित बिहार बनाने का संकल्प पूर्ववत कायम रहेगा. जो नई सरकार बनेगी, उसको मेरा पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा.'
ये लाइनें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखी इन लाइनों के आईने में आप बिहार के राजनीतिक अध्याय से एक चैप्टर के अंत के आगमन की आवाभगत कर सकते हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार की मिट्टी छोड़कर अब राज्यसभा की शोभा बढ़ाएंगे. उन्होंने एक्स पर 10 बजकर 54 मिनट पर लिखा कि पिछले दो दशक से भी अधिक समय से आपने अपना विश्वास एवं समर्थन मेरे साथ लगातार बनाए रखा है, तथा उसी के बल पर हमने बिहार की और आप सब लोगों की पूरी निष्ठा से सेवा की है. आपके विश्वास और समर्थन की ही ताकत थी कि बिहार आज विकास और सम्मान का नया आयाम प्रस्तुत कर रहा है. इसके लिए पूर्व में भी मैंने आपके प्रति कई बार आभार व्यक्त किया है. संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ. इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूं.
जेपी आंदोलन से निकले 3 नायक-
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक्स पर ये बयान आने के बाद सभी सियासी अटकलबाजी थम सी गई है. उसके साथ ही लालू यादव, रामविलास पासवान और अब नीतीश कुमार के युग के अंत की तस्वीर एक फ्रेम में आ गई है. बिहार की राजनीतिक मिट्टी में एक ऐसी खुशबू रही है जिसने देश को जयप्रकाश नारायण (जेपी) जैसा व्यक्तित्व दिया. 1970 के दशक के उस छात्र आंदोलन की कोख से तीन बड़े नायक लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार निकले. इन तीनों ने मिलकर बिहार की सत्ता और सामाजिक ताने-बाने को पिछले पांच दशकों तक अपने इर्द-गिर्द घुमाया. लेकिन आज, जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े हैं, तो बिहार की राजनीति का वह 'समाजवादी अध्याय' अब अपना अंतिम पन्ना लिख चुका है. यह अंत सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि उस विचारधारा के अवसान का भी है, जिसने 'राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होगा' का नारा दिया था.
आइए कुछ पीछे चलते हैं. इस कहानी की शुरुआत 10 मार्च, 1990 को हुई थी, जब लालू प्रसाद यादव ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. वह दौर बदलाव का था. सदियों से हाशिए पर पड़े पिछड़ों और दलितों को लालू ने आवाज दी. उनके शासन के शुरुआती साल सामाजिक न्याय के चरम के रूप में देखे गए. लेकिन, सत्ता का नशा और भ्रष्टाचार के आरोपों (चारा घोटाला) ने इस नायक को कानून के शिकंजे में ला खड़ा किया. 1997 में जब जेल जाने की नौबत आई, तो लालू ने जिस परिवारवाद का विरोध किया था, उसी का सहारा लिया. उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया.
अखबारों की पुरानी कतरनें गवाह हैं कि उस वक्त नीतीश कुमार ने तंज कसते हुए कहा था, "राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने के बाद मेरी इस पद में कोई रुचि नहीं रही." यह बयान उस समय के नीतीश के आदर्शों का प्रतीक था. हालांकि, लालू का परिवारवाद यहीं नहीं रुका. आज उनकी पूरी विरासत उनके बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों (मीसा भारती और रोहिणी आचार्या) के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है. तेजस्वी यादव भले ही आज राजद को एक नए और युवा स्वरूप में पेश कर रहे हों, लेकिन पार्टी की चाबी आज भी उसी 'लालू परिवार' के पास है.
इसी त्रयी के दूसरे स्तंभ थे रामविलास पासवान. उन्होंने दलित चेतना को मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा. वह केंद्र की राजनीति के 'मौसम विज्ञानी' कहे जाते थे, जो हवा का रुख भांपकर गठबंधन बदलने में माहिर थे. पासवान ने भी सार्वजनिक मंचों से परिवारवाद पर कड़े प्रहार किए, लेकिन जमीन पर उन्होंने अपने भाइयों और फिर अपने बेटे चिराग पासवान को राजनीति की सीढ़ियां चढ़ाईं. 2020 में उनके निधन के बाद लोजपा दो फाड़ हुई, लेकिन उनके परिवार का दबदबा बरकरार रहा. आज चिराग पासवान एनडीए के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जो अपने पिता की विरासत को 'हनुमान' बनकर आगे बढ़ा रहे हैं.
सुशासन बाबू के नाम से फेमस हैं नीतीश कुमार-
अब बात आती है नीतीश कुमार की, जिन्हें सुशासन बाबू कहा गया. उन्होंने लालू के 'जंगलराज' के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बिहार को बुनियादी ढांचे, सड़क और बिजली के मामले में एक नई पहचान दी. नीतीश की राजनीति हमेशा 'नीति और नियत' के दावों पर टिकी रही. उन्होंने लंबे समय तक खुद को परिवारवाद से दूर रखा. उनका बेटा निशांत कुमार, जो एक इंजीनियरिंग स्नातक हैं, सालों तक राजनीति की चकाचौंध से दूर आध्यात्मिक और निजी जीवन जीते रहे. अब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं. बेटे निशांत सक्रिय रूप से नेताओं से मिल रहे हैं. उधर, बीजेपी की रणनीति पूर्व में भी कुछ ऐसी ही थी. आपको याद होगा, 2022 में नीतीश कुमार को राज्यसभा के जरिए उपराष्ट्रपति बनाने तक की बात हुई थी. कमोवेश इस बात पर मुहर लग गई थी कि नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं. बिहार की राजनीति के केंद्र में बीजेपी रहेगी. नीतीश कुमार को अब दिल्ली में उपराष्ट्रपति बनाकर बैठा दिया जाएगा. लेकिन ठीक ऐन वक्त पर नीतीश कुमार ने महागठबंधन का दामन थामा. और बिहार के मुख्यमंत्री बन गए.
उधर, बीजेपी की रणनीति भी यहां स्पष्ट है, नीतीश को केंद्र में एक सम्मानजनक विदाई देकर बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में खुद का मुख्यमंत्री बनाना. यदि निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो यह नीतीश के लिए अपने बेटे को सुरक्षित राजनीतिक जमीन देने का सबसे बड़ा दांव होगा. बिहार में आज जो संक्रमण काल चल रहा है, वह मंडल कमीशन के बाद की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ है. लालू, पासवान और नीतीश ने जाति को अपनी शक्ति बनाया. लालू ने यादवों को, नीतीश ने कुर्मी और ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) को, तो पासवान ने दलितों को लामबंद किया. लेकिन 2026 का बिहार अब बदल रहा है.
अमित शाह और पीएम मोदी हिंदू एकीकरण और विकास के जरिए जाति की इन दीवारों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वे कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर नीतीश के ईबीसी वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं. तेजस्वी यादव अब केवल जाति की नहीं, बल्कि 'नौकरी' और 'आर्थिक न्याय' की बात कर रहे हैं. 'जन सुराज' के माध्यम से प्रशांत किशोर बिहार के युवाओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि लालू-नीतीश के 35-40 सालों ने बिहार को पिछड़ेपन के अलावा कुछ नहीं दिया.
लालू का 1990 का शपथ ग्रहण समारोह जिस क्रांति का आगाज था, वह आज परिवारवाद के दलदल में ठहरा हुआ महसूस होता है. नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और निशांत कुमार का उदय इस बात की तस्दीक है कि अब बिहार की राजनीति के पुराने शेर थक चुके हैं. उनकी आंखें अब सामाजिक न्याय के सपनों के बजाय अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित देखने में ज्यादा लगी हैं. यह बिहार की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म होने जैसा है। आने वाले वर्षों में बिहार 'जाति बनाम विकास' की एक नई लड़ाई देखेगा. क्या बिहार के लोग अब भी उन्हीं पुराने नामों के उत्तराधिकारियों को चुनेंगे, या फिर किसी नई विचारधारा को मौका देंगे? यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि लालू-पासवान-नीतीश की वह त्रयी, जिसने दशकों तक बिहार को अपनी उंगलियों पर नचाया, अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रही है.
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