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BMC Election Results 2026: ठाकरे भाई मिलकर भी मुंबई क्यों नहीं बचा पाए? ये है Inside Story

BMC Election Analysis: महाराष्ट्र में बीएमसी के चुनावों मे बीजेपी ने शिंदे के साथ मिलकर बड़ी जीत हासील की है. बीजेपी को 89 सीटों पर तो वहीं शिंदे की पार्टी शिवसेना को 29 सीटों पर जीत मिली है. उधर, उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 65 और राज ठाकरे की मनसे को 6 सीटें मिली हैं. उद्धव और राज साथ आकर भी अपना जादू नहीं दिखा सके. आइए जानते हैं क्यों ठाकरे भाई मिलकर भी मुंबई की सत्ता नहीं बचा पाए?

 Raj Thackeray and Uddhav Thackeray (File Photo: PTI) Raj Thackeray and Uddhav Thackeray (File Photo: PTI)

महाराष्ट्र की राजनीती ने फिर एक बार करवट ली है और 28 साल बाद ठाकरे को सत्ता से परास्त कर दिया है. बीएमसी के चुनावों मे बीजेपी ने शिंदे के साथ मिलकर बड़ी जीत हासील की है. आंकड़े देखें तो बीजेपी 89, शिंदे की शिवसेना 29, उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 65 और राज ठाकरे की मनसे को 6 सीटें मिली हैं. 227 वॉर्ड की बीएमसी में 114 का मैजिक फिगर है, जिसे महायुती ने पार किया है. अब सवाल यह है कि क्यों शिवसेना और मनसे साथ आकर भी अपना जादू नहीं दिखा सके? क्यों ठाकरे भाई मिलकर भी मुंबई की सत्ता नहीं बचा पाए?

मुंबई में मराठी वोटों का क्या है समीकरण?
मुंबई में 36 विधानसभा चुनाव क्षेत्र में मिलकर 1 करोड से ज्यादा वोटर्स है. 227 वॉर्ड जो हैं, उनमें माना जाता है की 140 से ज्यादा वॉर्डस में मराठी वोटर्स चुनाव में निर्णायक की भूमिका में हैं. 40 से ज्यादा ऐसे वॉर्ड हैं, जिनमें परप्रांतिय या हिंदी भाषा बोलनेवाले लोग अधिक हैं. 40 ऐसे भी वॉर्ड हैं, जहां मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या अधिक है. 2017 के बीमसी चुनाव में बीजेपी ने 82 सीटें जीती थी. ठाकरे ने 84 सीटों पर झंडा लहराया था. बीजेपी ने जो 84 सीटें जीती थी, उनमे परप्रांतिय या फिर हिंदी भाषा बोलनेवाली ज्यादातर सीटें शामिल थीं. 40 से ज्यादा सीटें उन्होंने मराठी भाषा बोलनेवाले जहां पर दबदबा बनाए हैं, वहां से जीती थी. यानी ठाकरे का गढ़ पहले से यानी 2017 में ही बीजेपी ने तोड़ दिया था.

पार्टी टूटने से उद्धव को कितना नुकसान?
2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव को छोड़कर बीजेपी के साथ सरकार बनाई, और सीएम भी बन गए. उनके साथ 40 विधायक और 13 सांसद भी जुड़ गए. उसके बाद लोकसभा चुनाव में उद्धव ने महाविकास आघाडी के साथ मिलकर अच्छा करिश्मा दिखाया, लेकिन विधानसभा चुनाव में ‘बटेंगे तो कटेंगे’ यानी हिंदूत्व के मुद्दे पर शिंदे ने उन्हें पछाड़ दिया. 57 सीटों के साथ शिंदे फिर से बीजेपी के साथ सरकार में आए. लेकिन सीएम नहीं बन पाए. क्योंकि बीजेपी ने 132 सीटें जीतकर अपना परचम लहराया था. चुनाव शिंदे के नेतृत्व में लड़ने के बावजूद उन्हें सीएम नहीं बनाया गया. यह चीज उन्होंने अंडरलाइन कर दी थी और आंकड़ों का महत्व भी सामने आया. 

आगे बीएमसी का चुनाव था और शिंदे बहुत सावधान था. अगर उनके पास लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं रहे तो बीजेपी ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने पाले में ले लेगी और उससे शिवसेना की ताकत पर असर भी पड़ेगा, यह शिंदे ने जान लिया था. इसलिए सरकार आते ही और उपमुख्यमंत्री बनने के बावजूद शिंदे ने उद्धव ठाकरे की सेना फिर से तोड़ने का सिलसिला जारी रखा. शिंदे ने 2007, 2012 और 2017 का चुनाव लड़े 120 से ज्यादा पार्षदों के अपने साथ कर लिया. जिन्होंने 2017 का चुनाव जीता था, और जो उद्धव के साथ थे ऐसे 50 पार्षद शिंदे के साथ आ गए. शिंदे ने उसी के बलबूते पर बीजेपी से 90 सीटें अपने पाले में ली थी. लेकिन 50 पार्षदों के साथ उद्धव का केडर कुछ हद तक शिंदे के साथ भी जुड़ गया. हालांकि उसका बहुत ज्यादा असर नहीं रहा क्योंकी शिवसेना का ऑक्सिजन कही जानेवाली शिवसेना की शाखा ठाकरे के साथ मजबूती से खड़ी रही. पार्षदों के साथ बड़े पैमाने पर कार्यकर्ता नहीं गए. यानी मुंबई में शिवसेना की नींव फिर भी पक्की रही और इसी ताकत के साथ उद्धव मैदान में आए.

मराठी वोटों को मजबूत बनाने के लिए राज का साथ?
बीएमसी चुनाव में पहली बार मराठी अस्मिता और मराठी मानुष की बात करने वाली तीन पार्टियां चुनाव में दिखने वाली थी. शिंदे की शिवसेना, ठाकरे की शिवसेना और राज की मनसे लेकिन मनसे का प्रभाव उतना ज्यादा नहीं था. 2009 में मनसे का वोट शेअर 6.50 से 7% तक रहा, जो 2024 आते-आते 1.5 से 2% तक नीचे आया. लेकिन राज ठाकरे इसलिए भी जरूरी थे क्योंकि हर वॉर्ड में उनके कम से कम 2 से 3 हजार वोट थे. अगर उद्धव और राज साथ में नहीं आते तो इस टूट का फायदा शिंदे उठाते या फिर बीजेपी.

लोकसभा चुनाव में तो बीजेपी को बिनाशर्त सपोर्ट कर राज ने एक तरीके से मदद की थी. फडणवीस के साथ उनके रिश्ते भी मधुर रहे लेकिन विधानसभा चुनाव में राज के बेटे के लिए भी शिंदे ने दादर विधानसभा चुनाव क्षेत्र नहीं छोड़ा, इसकी टीस उनके मन में थी. राज ने मुंबई मे हिंदूत्व का ब्रांड एंबेसडर बनने की कोशिष भी की थी, लेकिन वह भी नाकाम रही. मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की उनकी मुहिम चर्चा मे रही, लेकिन उससे उन्हें कोई  राजनीतिक फायदा नहीं मिला. उससे एक बात साफ हो गई कि राज ठाकरे को केवल मराठी के मुद्दे पर ही लोग वोट देते हैं. जब राज ठाकरे की पार्टी पूरी तरह से कमजोर है, और जब बीजेपी हिंदी भाषा का सूत्र महाराष्ट्र पर लादने की कोशिष कर रही है, तब राज के लिए बीजेपी या शिंदेसेना के साथ जाना बहुत कठीन था और अकेले लड़ने जितनी ताकत भी नहीं दिख रही थी. तब राज के लिए मराठी का मुद्दा, अस्मिता और मराठी मानुष की ताकत के लिए उद्धव के साथ आना ही विकल्प बचा था. उधर, उद्धव के लिए भी राज का साथ आना मराठी वोटों की टूट रोकने के लिए जरूरी था. ऐसे में दोनों साथ आकर मराठी वोटों पर निर्भर रहकर मराठी के बलबुते पर ही चुनाव लड़ने पर सहमत हुए.

पराजित होकर भी इतनी सीटे मिलने के क्या हैं मायने?
उद्धव और राज ठाकरे साथ आकर भी बीएमसी चुनाव में करिश्मा नहीं दिखा सके. राज की पार्टी को 6 और उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना को 65 सीटें मिली. उधर, कांग्रेस 24 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही. बीजेपी और शिवसेना दोनों ने मिलकर 118 सीटें जीतकर बीएमसी की सत्ता पर कब्जा जमा लिया. हालांकि मैजिक फिगर से यह आंकड़ा सिर्फ 4 से ज्यादा है. दूसरी ओर ठाकरे और कांग्रेस मिलकर 100 के करीब आ चुके है. शिंदे केवल 29 सीटों पर ही अपना करिश्मा दिखा पाए. यदि वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी ने 135 सीटें लड़कर 89 सीटें जीती और 45% वोट शेयर सुरक्षित किया. ठाकरे की शिवसेना को 27% वोट मिले. शिवसेना एकनाथ शिंदे को 10% और मनसे को 2.87% वोट मिले.

कई विश्लेषक उद्धव और राज ठाकरे के इस सीमित यश को अहम मानते हैं क्योंकि शिवसेना शिंदे की वजह से टूटी और फिर शिंदे ने बारी-बारी नेताओं को तोड़कर उसे और कमजोर बनाया. शिंदे के पास बीजेपी का सपोर्ट होना, बीजेपी की महाराष्ट्र और केंद्र में सत्ता होना, संसाधनों में भी बीजेपी और शिंदे ठाकरे भाइयों के मुकाबले में बहुत ज्यादा ताकतवर थे, इस हिसाब से ठाकरे को मिली सीटें और अगर कांग्रेस की भी गिनती की जाए, तो मुंबई के मराठी लोगों ने ठाकरे का साथ निभाया है, यही साबित होता है. दूसरी ओर कई विश्लेषक यह भी दावा कर रहे हैं कि मराठी वोटर्स अब ठाकरे की अकेले की दौलत नहीं रहे. अब बीजेपी ने उसका बड़ा शेयर अपने साथ जोड़ लिया है. इस वजह से राज और उद्धव का एक साथ भी कोई जादू नहीं दिखा पाया. 

(अभिजीत करंडे की रिपोर्ट)