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SC on Wealth Distribution: क्या सरकार निजी स्वामित्व वाली संपत्ति का बंटवारा कर सकती है? संविधान में क्या है नियम, कब-कब Supreme Court ने की इसकी व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच में इस मसले पर सुनवाई हो रही है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 39(b) में बताए गए 'समुदाय के भौतिक संसाधनों' में निजी संसाधन शामिल है? सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद की कई बार व्याख्या की है. इस बार मुंबई के प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन ने महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास अधिनियम 1976 (MHADA) में एक संशोधन को चुनौती दी है.

Supreme Court of India Supreme Court of India

लोकसभा चुनाव में 'संपत्ति के बंटवारे' के मुद्दे पर सियासी घमासान मचा हुआ है. इसी बीच इससे जुड़े एक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई शुरू हो गई है. कोर्ट को तय करना है कि अगर निजी स्वामित्व वाली संपत्तियों को 'समुदाय के भौतिक संसाधन' के तौर पर माना जाता है तो क्या सरकर इन संपत्तियों का अधिग्रहण और पुनर्वितरण कर सकती है? चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (D Y Chandrachud की अध्यक्षता में 9 जजों की संविधान पीठ इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू कर चुकी है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि निजी और सामुदायिक संपत्ति के बीच का अंतर स्पष्ट होना चाहिए.

संविधान में क्या है जिक्र-
संविधान के भाग IV में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) का जिक्र है. इसके अनुच्छेद 39(b) के मुताबिक राज्य का दायित्व है कि वह ऐसी नीतियां बनाए, जो समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नितंत्रण इस तरह से करे, जो आम लोगों की भलाई के लिए सबसे अच्छा हो. DPSP का मकसद सिर्फ कानून बनाने के लिए मार्गदर्शन करना है. इसे किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है.

कई बार सुप्रीम कोर्ट ने की व्याख्या-
साल 1977 से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर अनुच्छेद 39(b) की व्याख्या की है. साल 1977 में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने कर्नाटक बनाम श्री रंगनाथ रेड्डी मामले में फैसला दिया था कि निजी स्वामित्व वाले संसाधन 'समुदाय के भौतिक संसाधनों' के दायरे में नहीं आते हैं.

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इस फैसले में एक जज कृष्ण अय्यर ने 3 जजों से अलग अलग राय दी थी, जो बाद में अहम साबित हुई. जस्टिस अय्यर ने कहा था कि निजी संपत्तियों को 'समुदाय के भौतिक संसाधनों' में गिना जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भौतिक दुनिया में मूल्य या इस्तेमाल की हर वस्तु भौतिक संसाधन है और व्यक्ति समुदाय का सदस्य होने के नाते उसका संसाधन समुदाय का हिस्सा है. निजी संसाधनों को अनुच्छेद 39(b) के दायरे से बाहर रखना उसे छिपाने के सामान है.

जस्टिस अय्यर की आर्टिकल 39(b) की इस व्याख्या पर साल 1983 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान मुहर लगा दी. यह मामला संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम भारत कोकिंग कोल का था. कोर्ट ने जस्टिस अय्यर के फैसले पर भरोसा जताते हुए कोयला खदानों और उससे संबंधित कोक ओवन प्लांट्स को नेशनलाइज कर दिया था. इस फैसले में ये भी मेंशन नहीं किया गया कि जस्टिस अय्यर की राय अल्पमत में थी और बहुमत ने इससे खुद को दूर रखा है.

साल 1996 के मफतलाल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम भारत संघ मामले में भी जस्टिस अय्यर की व्याख्या का सहारा लिया गया और 9 जजों की बेंच ने जस्टिस अय्यर और बेंच की व्याख्या पर भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि आर्टिकल 39(b) में आने वाले भौतिक संसाधन शब्द नेचुरल या फिजिकल रिसोर्सेज और चल या अचल संपत्ति भी शामिल होगी और इसमें ना सिर्फ सार्वजनिक संपत्ति, बल्कि भौतिक जरूरतों को पूरा करने के सभी निजी और सार्वजनिक सोर्स शामिल होंगे.

सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी क्या मामला है-
सुप्रीम कोर्ट में अभी जो मामला आया है, उसमें महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास अधिनियम 1976 (MHADA) में एक संशोधन को चुनौती दी गई है. इसमें जब्त की गई संपत्तियों के मालिकों ने ये चुनौती दी है. ये संशोधन साल 1986 में किया गया था.

साल 1976 में MHADA इसलिए बनाया गया था, ताकि मुंबई की कई पुरानी, जर्जर इमारतों में रहने वाले लोगों से सेस वसूला जाए और इन पैसों का इस्तेमाल उन जर्जर इमारतों की मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जाए. इन इमारतों में रहने वाले लोग इस सेस को मुंबई बिल्डिंग रिपेयर एंड रिकंस्ट्रक्शन बोर्ड को देना था. 

इस कानून में साल 1986 में धारा 1A जोड़ी गई. इसमें जमीनों और इमारतों का अधिग्रहण कर उन्हें 'जरूरतमंद लोगों' और 'ऐसी जमीनों और इमारतों के अधिभियोगियों' को ट्रांसफर करने की व्यवस्था की गई. संशोधन में इस कानून में चैप्टर VIII-A भी जोड़ा गया. इसमें कहा गया कि राज्य सरकार को सेस वाली इमारतों का जमीन के साथ अधिग्रहण की इजाजत होगी. हालांकि इसके साथ एक शर्त जोड़ी गई कि सरकार तभी इसका अधिग्रहण कर सकती है, जब वहां रहने वाले 70 फीसदी निवासी इसके लिए अनुरोध करें.

मुंबई में प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन ने इस कानून के चैप्टर VIII-A को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह संशोधन  संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन है. जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोई राहत याचिकाकर्ताओं ने साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट चले गए.

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य मुद्दा ये उठा कि क्या अनुच्छेद 39(b) में बताए गए 'समुदाय के भौतिक संसाधनों' में निजी संसाधन शामिल है? मार्च 2001 में 5 जजों की बेंच ने मामले की सुनवाई की और इसे बड़ी बेंच के पास भेज दिया. कोर्ट ने कहा कि संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग मामले में व्यक्त किए गए विचारों पर पुनर्विचार की जरूरत है.

फरवरी 2002 में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने इस मामले में सुनवाई की और कहा कि हमें इस मुद्दे पर व्यापक दृष्टिकोण को साझा करने में कुछ कठिनाइयां आ रही हैं. इसके बाद बेंच ने इसे 9 जजों की बेंच के पास भेज दिया. अब इस मामले में 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है.

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