
AIIMS दिल्ली की तस्वीरें
AIIMS दिल्ली की तस्वीरें
सुबह के चार बजे, दिल्ली की सर्दी और AIIMS के पास एक सबवे में कदम रखते ही जो दृश्य दिखा, उसने ठंड का एहसास पीछे छोड़ दिया. सबवे का पूरा फर्श लोगों से भरा था. दूर से देखने पर ऐसा लग रहा था मानो जमीन पर कंबलों की परत बिछी हो, लेकिन पास जाकर समझ आया कि ये कंबल नहीं, बल्कि इलाज की उम्मीद में आए मरीज और उनके परिजन थे, जो खुले में रात गुजारने को मजबूर थे.
कई लोग पतले कंबलों में सिर से पैर तक ढके हुए थे. ठंडी हवा से बचने के लिए वे कंबल और नीचे बिछी तिरपाल को कसकर पकड़े हुए थे. उसी भीड़ में एक व्यक्ति दिखा, जिसकी एक आंख पर पट्टी बंधी थी. धीरे से पूछने पर उसने बताया, 'आंख का कैंसर है.' वह पिछले एक महीने से यहीं सबवे में सो रहा था. ठंडे फर्श पर लेटे-लेटे उसका शरीर दर्द से भर गया था और नींद ठीक से नहीं आती थी. वह अकेला आया था, क्योंकि दो लोग आने का मतलब था खर्च बढ़ जाना. लेकिन अब सवाल उठता है कि आखिर सबवे में लोग ऐसे लेटे हुए क्यों थे? क्या कारण था कि इतनी व्यवस्था होने के बाद भी लोगों को दिल्ली की भयंकर ठंड में मरीजों को ठंडे फर्श में लटकर दिनरात गुजारना पड़ रहा है? चलिए आपको पूरी बात बताते हैं.
सबवे में नहीं है कोई शौचालय
दिल्ली AIIMS, जहां लोग इलाज की उम्मीद में तो आए थे, लेकिन कम पैसे या यूं कहें कि गरीब होने के कारण सबने पर ही इस तरह से रातें गुजारनी पड़ रही हैं. इंडिया टुडे के रिपोर्टर ग्राउंड जीरो पर पहुंचे और उन्होंने वहां बसर कर रहे लोगों के बातचीत कर अपना एक्सपीरियंस शेयर किया. उन्होंने देखा कि, पास ही एक बुजुर्ग महिला उठकर सीढ़ियों की ओर जाने लगी. पूछने पर पता चला कि वह शौच के लिए जा रही थी. सबवे में कोई शौचालय नहीं है. AIIMS के अंदर शौचालय है, लेकिन वह कब खुलेगा, किसी को नहीं पता. नहाने की समस्या और भी गंभीर थी. एक मरीज, जिसके शरीर में यूरिन बैग लगा था उसने बताया कि नहाने के लिए पैसे देने पड़ते हैं. इसी वजह से वह 10-15 दिन में एक बार ही नहा पाता है. डॉक्टर रोज नहाने की सलाह देते हैं, लेकिन गरीब मरीजों के लिए साफ-सफाई भी एक खर्च बन चुकी है. उसने कहा, 'हम तभी नहाते हैं, जब पैसे होते हैं.'
सुबह होते-होते, करीब 60 साल की एक महिला दर्द से कराहते हुए उठी. उसका पति असहाय होकर उसके पास बैठा था. उसने बताया कि इलाज के लिए वे बार-बार गांव लौटते हैं, ब्याज पर पैसा उधार लेते हैं, फिर दिल्ली आते हैं. पैसा खत्म होता है तो फिर गांव लौट जाते हैं. यह सिलसिला महीनों से चल रहा है. 'हम यहां कैसे रहें? क्या खाएं? क्या करें?' उनके इन सवालों का कोई जवाब नहीं था. कुछ लोगों को समाजसेवियों ने कंबल दिए थे, जिन्हें वे ठंड से बचने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे.

सबवे, फ्लाईओवर के नीचे और फुटपाथों पर रहने को मजबूर
सुबह करीब 5 बजे रिपोर्टर ने देख कि, AIIMS के सामने मरीजों की लंबी कतारें लग चुकी थीं. कोई मध्य प्रदेश से आया था, तो कोई उत्तराखंड से. कुछ लोग सिर्फ अपॉइंटमेंट वाले दिन आते हैं और जांच के बाद वापस लौट जाते हैं, क्योंकि वे दिल्ली में रुकने का खर्च नहीं उठा सकते. यहीं एक कड़वी सच्चाई सामने आती है. जिनके पास पैसा है, वे हर अपॉइंटमेंट पर आते हैं, इलाज कराते हैं और घर लौट जाते हैं. जिनके पास पैसा नहीं है, वे सबवे, फ्लाईओवर के नीचे और फुटपाथों पर रहने को मजबूर हैं.
करीब 6:40 बजे सबवे में हलचल शुरू हो गई. सफाईकर्मी आने वाले थे, लोगों को हटने के लिए कहा गया. कंबल समेटे जाने लगे. माएं बच्चों को जगाने लगीं. रिपोर्टर ने देखा कि, एक छोटी बच्ची, जो गहरी नींद में थी, डरकर उठी और रोते हुए एक महिला से चिपक गई. कुछ देर में सामने से आवाज आती है 'अपना सामान समेटो और यहां से हटो.' उस समय तापमान करीब 7 डिग्री था.
देश के सबसे बड़े और जानेमान अस्पताल का हाल
यह सबवे, देश के सबसे बड़े और जानेमान अस्पतालों में से एक AIIMS से बस कुछ कदम की दूरी पर है. फिर भी मरीज ठंडे फर्श पर रात गुजारने को मजबूर हैं. सवाल सिर्फ सुविधाओं या स्टाफ की कमी का नहीं है. RTI के मुताबिक AIIMS में स्वीकृत 1,306 फैकल्टी पदों में से 524 खाली हैं. कागज पर ये आंकड़े हैं, लेकिन जमीन पर इनका असर ठंड, दर्द और अपमान के रूप में दिखता है. यह कहानी सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था की नहीं है, यह मानवीय गरिमा की कहानी है. सुबह चार बजे की फुसफुसाती बातचीत से लेकर भोर की जल्दबाजी तक, कहीं न कहीं मरीजों की गरिमा चुपचाप खोती नजर आती है. इलाज की तलाश में आए ये लोग सिर्फ दवा नहीं, सम्मानजनक जीवन की भी उम्मीद लेकर दिल्ली पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा जीवन जीना पड़ता है.
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