IPhone 18 vs keypad phone
IPhone 18 vs keypad phone
नए iPhone के लॉन्च के साथ एक बार फिर लोगों में फोन को लेकर क्रेज देखने को मिला. लोग कल रात से iPhone खरीदने के लिए लाइन में लगे थे. दिल्ली के साकेत मॉल में ग्राहक नया iPhone खरीदने पहुंचे. हर किसी पहले दिन आईफओन खरीदना था. इसी भीड़ में एक ग्राहक समीर भी थे, जो दो फोन खरीदने पहुंचे थे. समीर ने बताया कि उन्होंने दो फोन खरीदा है, एक अपने लिए और दूसरा अपनी 8 साल की बेटी के लिए, क्योंकि उनकी बेटी उनका iPhone लेकर खेलती रहती है. बस इसी बात पर समीर ने उसे नया iPhone गिफ्ट कर दिया. लोगों का यह क्रेज देखकर वह दिन याद आ जाता है, जब 90s के बच्चों के लिए मोबाइल फोन आखिर कितना बड़ा सपना हुआ करता था.
90s के बच्चों को फोन कब मिलता था?
आज के बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन देखकर शायद 90s के बच्चे अपने बचपन को याद करने लगें. उस समय घर में मोबाइल फोन होना ही बड़ी बात हुआ करती थी. पूरे परिवार में एक या दो फोन हुआ करता था. वहीं कई बच्चों को तो फोन कॉलेज या ग्रेजुएशन के समय मिला करता था. किसी-किसी घर में बच्चे चुपके से घरवालों का फोन इस्तेमाल किया करते थे. फोन मिल भी गया तो उसमें आज जैसी सुविधाएं कहां थीं. कॉल करना, SMS भेजना और कुछ गिने-चुने काम ही मोबाइल से हो पाते थे. फोटो खींचने के लिए भी कीपैड वाले ही फोन आते थे. वह भी कैमरा सभी कीपैड फोन में उपलब्ध नहीं होता था.
SMS भेजने के भी पैसे लगते थे
आज तो SMS का इस्तेमाल भी लोग बहुत कम करते हैं. कभी फोन में यही फीचर सबसे बड़ी जरूरत हुआ करता था. ज्यादा समय नहीं बीता है, लगभग 1.5 दशक पहले की बात है और आज हम कहां से कहां पहुंच गए हैं. WhatsApp पर कितने भी मैसेज भेज दीजिए, पैसे नहीं लगते. केवल इंटरनेट के रिचार्ज से ही कई काम हो जाते हैं. लेकिन 90s और शुरुआती 2000s के दौर में SMS भी सोच-समझकर करना पड़ता था. हर मैसेज के पैसे लगते थे. इसलिए जरूरी मैसेज ही भेजे जाते थे और कई बार लोग एक-एक शब्द सोचकर लिखते थे. आज बच्चों के पास इंटरनेट, वीडियो कॉल, सोशल मीडिया और ढेरों ऐप हैं. उस समय मोबाइल में इतना कुछ कहां था. आज एक क्लीक से कई काम हो जाता है. उस दौर में एक काम करने के लिए कई क्लीक करने पड़ते थे. केवल 'c' टाइप करने के लिए '2' नंबर वाले बटन को तीन बार दबाना पड़ता था.
गेम के नाम पर Snake ही काफी था
आज के बच्चों के पास हाई-ग्राफिक्स वाले गेम हैं, लेकिन उस दौर में मोबाइल गेम का मतलब ही Snake हुआ करता था. हालांकि, फोन की छोटी सी स्क्रीन पर सांप को आगे बढ़ाते हुए ज्यादा से ज्यादा स्कोर बनाने का अपना ही मजा था. उस समय वही छोटा सा गेम काफी लगता था. आज के बच्चों को शायद यह सुनकर भी हैरानी हो कि कभी फोन में गेम खेलने के लिए भी बस एक ही विकल्प हुआ करता था. लेकिन जो भी कहा जाए, वह दौर भी काफी अच्छा हुआ करता था. मां-बाप का फोन पहले छिपकर लेना और फिर कहीं दूसरी जगह बैठकर गेम खेलने का अपना ही मजा था.
फोन लिया है, पता चल जाए तो डांट पड़ती थी
उस जमाने में अगर घर में किसी को पता चल जाता था कि बच्चे ने फोन लिया है या चुपके से इस्तेमाल कर रहा है, तो डांट पड़ना भी तय था. फोन को जरूरत की चीज माना जाता था, बच्चों के मनोरंजन की चीज नहीं. यही वजह है कि 90s के बच्चों को अपना मोबाइल मिलना किसी बड़ी उपलब्धि जैसा लगता था.
अच्छे नंबर लाओ, फिर मिलेगा फोन
90s के बच्चों के लिए मोबाइल पाने का रास्ता भी इतना आसान नहीं था. बच्चों को पहले मम्मी-पापा को इंप्रेस करना पड़ता था. अच्छे नंबर लाने पर फोन दिलाने का वादा मिलता था. लेकिन कई बार 10वीं के अच्छे नंबर की शर्त रख दी जाती थी. 10वीं आई तो यही वादा 12वीं पर चला जाता था. इसके बाद भी फोन मिलेगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं होती थी.
आज 8 साल के बच्चे के लिए भी iPhone!
अब जरा आज का समय देखिए. दिल्ली में समीर ने अपनी 8 साल की बेटी के लिए नया iPhone खरीदा है. उनका कहना है कि बेटी उनका फोन लेकर खेलती रहती है, इसलिए उन्होंने उसके लिए अलग फोन लेने का फैसला किया. यहीं से फर्क साफ नजर आता है. एक समय था जब 90's के बच्चों को ग्रेजुएशन के आसपास फोन मिलता था और आज छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन है. बेशक समय के साथ टेक्नोलॉजी हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है. लेकिन 90s के बच्चों के लिए मोबाइल सिर्फ फोन था, जबकि आज की पीढ़ी के लिए वही फोन पढ़ाई, गेम, मनोरंजन, कैमरा, सोशल मीडिया और पूरी दुनिया से जुड़ने का जरिया बन चुका है. या यूं कहें कि उनके लिए पूरी दुनिया बन गई है.
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