अत्तर कौर और रतन देवी
अत्तर कौर और रतन देवी
13 अप्रैल 1919 का दिन भारतीय इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसे कोई भूल नहीं सकता. जलियांवाला बाग हत्याकांड ने अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता को दुनिया के सामने उजागर कर दिया. इस घटना के बाद सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई अंग्रेज बुद्धिजीवियों ने भी इसकी आलोचना की. बढ़ती आलोचना और बदनामी को कम करने के लिए अंग्रेजों ने एक रास्ता निकाला कि पीड़ित परिवारों को आर्थिक मुआवजा देने का.
इस काले दिन की चीख कई सालों तक गुंजी. करीब दो साल बाद, 15 जून 1921 से मुआवजे का वितरण शुरू हुआ. कई इतिहासकारों के अनुसार, इस मुआवजे का मकसद सिर्फ नुकसान की भरपाई नहीं, बल्कि लोगों के जख्मों को 'पैसों से भरने' और उन्हें चुप करवाने की कोशिश भी था, ताकि वे इस घटना को भूल जाएं.
जब दो महिलाओं ने ठुकरा दिया 'खून का पैसा'
जहां कई परिवारों ने मजबूरी में मुआवजा स्वीकार किया, वहीं दो महिला ऐसी भी थीं, जिन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. ये थीं भगमल भाटिया और छज्जू भगत की विधवाएं, अत्तर कौर और रतन देवी. दोनों को 25,000 रुपये का मुआवजा देने की पेशकश की गई थी, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी. लेकिन उनके लिए यह पैसों का सवाल नहीं था. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे अपने पतियों के हत्यारों से कोई मदद नहीं लेंगी.
उनका मानना था कि इस पैसे को लेना उनके पतियों के खून की कीमत लगाने जैसा होगा. उनके लिए यह सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि 'खून का पैसा' था, जिसे स्वीकार करना उन्हें अपराध जैसा लगता था.
अत्तर कौर की हिम्मत
जनरल रेजिनाल्ड डायर और उसके सैनिकों के वहां से जाने के बाद भी जलियांवाला बाग का मंजर भयावह था. ऐसे हालात में भी गर्भवती अत्तर कौर हिम्मत जुटाकर अपने पति का शव लेने बाग पहुंचीं. पड़ोसी सांता मिश्रा की मदद से उन्होंने अपने पति का शव घर तक पहुंचाया. अत्तर कौर का परिवार अमृतसर के मोहन नगर इलाके में रहता था. उनका बड़ा बेटा मोहन लाल उस समय इतना छोटा था कि परिवार का कारोबार संभाल नहीं सकता था. ऐसे में घर चलाने की जिम्मेदारी अत्तर कौर पर आ गई और उन्होंने घरेलू काम करके किसी तरह परिवार को संभाला. लेकिन अंग्रेजों से मुआवजे के पैसे नहीं लिए.
रतन देवी की कहानी
रतन देवी की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक और दिल दहला देने वाली है. जब बाग में गोलियां चलनी शुरू हुईं, तब वह अपने घर पर थीं. जैसे ही गोलियों की आवाज सुनाई दी उनका दिल घबरा उठा, क्योंकि उनके पति उसी बाग में मौजूद थे. हत्याकांड के बाद जब जनरल डायर और उसकी सेना वहां से चली गई, तब भी बाग का मंजर भयावह था. चारों तरफ लाशें बिखरी थीं और जमीन खून से लथपथ थी. इसी बीच, गर्भवती अत्तर कौर अपने पति का शव लेने के लिए बाग में दाखिल हुईं. वह दो अन्य महिलाओं के साथ घटनास्थल पर पहुंचीं और वहां का दृश्य देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. उनके पति का शव खून से सनी लाशों के बीच पड़ा था.
उन्होंने बताया कि कुछ देर बाद पड़ोसी के बेटे वहां पहुंचे, लेकिन उन्होंने उन्हें वापस भेज दिया ताकि वे चारपाई लेकर आएं. इसके बाद रात होने लगी और अंग्रेजों द्वारा कर्फ्यू लगा दिया गया. जिस कारण वह दोनों लड़के वापिस नहीं आएं. रतन देवी वहीं खड़ी अपने पति के शव के पास रोती रहीं. चारों तरफ सन्नाटा, लाशें और घायल लोग थे और वह बिल्कुल अकेली थीं.
कुछ देर बाद एक सिख युवक वहां आया. रतन देवी ने उससे मदद मांगी. यह माना जाता है कि वह युवक सरदार उधम सिंह हो सकते थे, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई. उस युवक की मदद से उन्होंने अपने पति के शव को एक सूखी जगह पर रखा. लेकिन इसके बाद भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं.
रतन देवी मदद के लिए पास के मोहल्लों में गईं, लेकिन कर्फ्यू के डर से किसी ने उनकी मदद नहीं की. बाजार में भी उन्होंने लोगों से गुहार लगाई, लेकिन कोई साथ आने को तैयार नहीं हुआ. फिर अगले सुबह वह अपने पति के शव को लेकर घर पहुंची.
13 अप्रैल की रात का मंजर
रतन देवी ने बाद में अपने बयान में कहा कि उस रात जो कुछ उन्होंने देखा, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. चारों तरफ लाशें थीं, कुछ लोग पीठ के बल गिरे थे, कुछ मुंह के बल. कई मासूम बच्चे भी वहां पड़े थे. यह सिर्फ एक घटना नहीं थी, बल्कि इंसानियत को झकझोर देने वाला मंजर था.
रतन देवी की कोई संतान नहीं थी और उनके पति ही उनका एकमात्र सहारा थे. उनके बाद उनके जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती, लेकिन उनकी वह एक रात इतिहास में हमेशा जिंदा रहेगी.
शहादत का सम्मान
अत्तर कौर और रतन देवी ने जो फैसला लिया, वह न केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि एक संदेश था. उन्होंने दिखाया कि शहादत की कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती. जब पूरी दुनिया दर्द में थी, तब इन महिलाओं ने अपने स्वाभिमान को चुना. उन्होंने साबित किया कि कुछ जख्म ऐसे होते हैं, जिन्हें पैसे से भरा नहीं जा सकता. इन दोनों वीरांगनाओं की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि असली सम्मान वही है, जो कठिन समय में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने से मिलता है.
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