Women Empowerment Story
Women Empowerment Story
बेटियां और महिलाएं अगर ठान लें तो हुनर को रोजगार और परंपरा को पहचान में बदल सकती हैं. झांसी की चार बहनें आज महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही हैं. पढ़ाई के साथ ये बहनें अपने परिवार की करीब 15 साल पुरानी मूर्ति निर्माण की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. साधना वर्मा, किरण वर्मा, ज्योति वर्मा और दीपका वर्मा अपने भाई रोहित के साथ मिलकर मां दुर्गा समेत अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को आकार दे रही हैं. चारों बहनों की ग्रेजुएशन पूरी हो चुकी है और वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं. इसके बावजूद वे परिवार के पारंपरिक काम से जुड़ी हुई हैं. पढ़ाई और मूर्ति निर्माण को साथ लेकर चल रही इन बहनों ने यह साबित किया है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए किसी एक रास्ते पर निर्भर रहना जरूरी नहीं, बल्कि अपने हुनर को भी आगे बढ़ाया जा सकता है.
इस बार तैयार की गईं करीब 150 मूर्तियां
इस बार परिवार ने करीब 150 मूर्तियां तैयार की हैं. इनमें मां काली की चार प्रतिमाओं के साथ मोठ, मुन्नालाल धर्मशाला, ग्वालियर और बगरमंडी सहित अलग-अलग स्थानों के लिए तैयार की गई मूर्तियां शामिल हैं. फिलहाल मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों को अंतिम रूप देने का काम चल रहा है. प्रतिमाओं की रंगाई, सजावट और बारीक काम में चारों बहनें जुटी हुई हैं.
दो साल तक भाई ने सीखा मूर्ति बनाने का काम
किरण वर्मा बताती हैं कि उनके भाई ने करीब दो साल तक मूर्ति बनाने का काम सीखा. इसके बाद परिवार ने खुद मूर्तियां तैयार करना शुरू किया. धीरे-धीरे यही काम परिवार की पहचान बन गया. पिछले करीब 15 वर्षों से परिवार पूरी तरह मूर्ति निर्माण के काम से जुड़ा हुआ है. परिवार में चार बहनें, एक भाई और पिता हैं. मां का निधन हो चुका है. इसके बाद भी चारों बहनों ने भाई और पिता के साथ मिलकर परिवार के इस पारंपरिक काम को आगे बढ़ाया. अब मूर्ति निर्माण में उनकी अपनी अलग पहचान बनती जा रही है. इन सभी मूर्तियों को तैयार करने में करीब 6 से 7 महीने तक का समय लगता है. मिट्टी से लेकर प्रतिमा के अंतिम रूप और सजावट तक हर चरण में काफी मेहनत और धैर्य की जरूरत होती है.
पढ़ाई के साथ हुनर को बनाया आत्मनिर्भरता का जरिया
किरण वर्मा के मुताबिक, चारों बहनें पढ़ाई के साथ मूर्ति निर्माण करती हैं. सभी बहनों की ग्रेजुएशन पूरी हो चुकी है और वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं. पढ़ाई के साथ परिवार के इस पारंपरिक काम में लगातार हाथ बंटाने से अब उन्हें मूर्ति निर्माण में काफी रुचि और लगाव हो गया है. उनका कहना है कि यह काम उनके लिए सिर्फ पारिवारिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और आत्मनिर्भर बनने का जरिया भी है. परिवार की कला को आगे बढ़ाते हुए उन्हें अपनी मेहनत का परिणाम प्रतिमाओं के रूप में दिखाई देता है.
काली और लाल मिट्टी से तैयार होता है मां का स्वरूप
ज्योति वर्मा बताती हैं कि वह अपनी तीनों बहनों के साथ मिलकर करीब 150 मूर्तियां तैयार कर रही हैं. इन प्रतिमाओं को तैयार करने में करीब 6 से 7 महीने का समय लगा है. मूर्तियां बनाने में काली और लाल मिट्टी, घास, पानी, कलर, पेंट और सजावट की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए प्रतिमाओं में कच्चे पेंट का इस्तेमाल किया जाता है. ज्योति के मुताबिक, मूर्तियों से जुड़ी ज्यादातर सजावट की सामग्री कोलकाता से मंगाई जाती है. अलग-अलग मॉडल और डिजाइन के आधार पर प्रतिमाओं को तैयार किया जाता है.
बंगाली पैटर्न में तैयार होती हैं भव्य प्रतिमाएं
चारों बहनों के यहां तैयार होने वाली अधिकांश प्रतिमाएं बंगाली पैटर्न पर बनाई जाती हैं. मां दुर्गा के चेहरे की बनावट से लेकर मुकुट, आभूषण, वस्त्र और सजावट तक हर चीज में बारीकी का ध्यान रखा जाता है. यही वजह है कि उनके यहां तैयार होने वाली प्रतिमाएं झांसी के अलावा बुंदेलखंड के अलग-अलग क्षेत्रों के पंडालों तक पहुंचती हैं. कोलकाता से मंगाई जाने वाली विशेष सजावट सामग्री प्रतिमाओं को और आकर्षक रूप देती है.
चार बहनों की मेहनत में दिख रही महिला सशक्तिकरण की तस्वीर
ज्योति वर्मा बताती हैं कि महिलाओं को आगे बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए मिलने वाली प्रेरणा से उन्हें इस काम को आगे बढ़ाने का हौसला मिलता है. चारों बहनों की कहानी आज की उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो पढ़ाई और करियर के साथ अपने परिवार के हुनर और परंपरा को भी आगे बढ़ाना चाहती हैं. एक ओर किताबें और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, दूसरी ओर मिट्टी से मां दुर्गा की प्रतिमाओं को आकार देने का हुनर इन दोनों जिम्मेदारियों को चारों बहनें बखूबी निभा रही हैं.
इन दिनों कार्यशाला में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. कोई प्रतिमा के चेहरे की रंगत निखार रहा है, तो कहीं मुकुट और आभूषण लगाए जा रहे हैं. महीनों की मेहनत के बाद तैयार हो रही ये प्रतिमाएं जल्द ही झांसी और बुंदेलखंड के अलग-अलग पंडालों की शोभा बढ़ाएंगी. चार बहनों की यह कहानी सिर्फ मूर्ति निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता और हुनर की ऐसी मिसाल है, जहां पढ़ी-लिखी बेटियां अपने सपनों के साथ परिवार की 15 साल पुरानी परंपरा को भी नई पहचान दे रही हैं.
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