Kerala assembly election
Kerala assembly election
केरल में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन के संकेत साफ नजर आ रहे हैं. रुझानों में कांग्रेस नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) बढ़त बनाए हुए है और अगर यही ट्रेंड जारी रहता है, तो पार्टी करीब 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर सकती है. यह प्रदर्शन दो दशकों में उसका सबसे बेहतर माना जा रहा है. वहीं, वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) के लिए यह झटका बड़ा साबित हो सकता है, क्योंकि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन लगातार दो बार सरकार बनाने वाले राज्य के पहले नेता रहे हैं.
1. एकजुटता बनी सबसे बड़ी ताकत
पिछले चुनावों में कांग्रेस की अंदरूनी कलह उसकी हार का बड़ा कारण बनी थी, लेकिन इस बार पार्टी ने इससे सबक लिया. चुनाव से पहले ही नेतृत्व ने संगठन को एकजुट रखने पर खास ध्यान दिया. शशि थरूर को लेकर चल रही अटकलों और मतभेदों को भी समय रहते सुलझा लिया गया. राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उनसे बातचीत कर मतभेद दूर किए और उन्हें प्रचार अभियान में अहम जिम्मेदारी दी. इसका असर यह हुआ कि पार्टी कार्यकर्ता एकजुट नजर आए.
2. सोच-समझकर टिकट बंटवारा
टिकट बंटवारे में भी कांग्रेस ने इस बार रणनीतिक तरीके अपनाए. वरिष्ठ नेता मधुसूदन मिस्त्री को इसकी जिम्मेदारी दी गई. उन्हें मिले फीडबैक के आधार पर पार्टी ने ऐसे उम्मीदवार उतारे, जो स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखते थे. खास बात यह रही कि मौजूदा विधायकों के खिलाफ ज्यादा नाराजगी नहीं थी, इसलिए पार्टी ने संतुलन बनाए रखते हुए युवाओं को भी मौका दिया.
3. सांसदों को चुनाव से दूर रखने का फैसला
कांग्रेस ने एक अहम फैसला लेते हुए किसी भी सांसद को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया. हालांकि, इस फैसले का अंदरखाने विरोध भी हुआ, लेकिन नेतृत्व ने इसे सख्ती से लागू किया. असंतुष्ट नेताओं को मनाने के लिए वरिष्ठ नेताओं को आगे आना पड़ा. राहुल गांधी ने खुद बातचीत कर नाराजगी दूर की. इससे यह संदेश गया कि पार्टी नेतृत्व सभी को साथ लेकर चल रहा है और अनुशासन को प्राथमिकता दे रहा है.
4. आक्रामक प्रचार और मजबूत सामाजिक समीकरण
चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी. राहुल गांधी ने खुद मोर्चा संभाला और राज्य सरकार पर तीखे हमले किए. साथ ही, पार्टी ने अपनी गारंटियों को भी जोर-शोर से प्रचारित किया, जिसमें स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाएं शामिल थीं. सामाजिक समीकरणों को भी संतुलित रखने की कोशिश की गई. मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन से मुस्लिम वोट बैंक मजबूत रहा, वहीं ईसाई समुदाय को साधने के लिए संगठनात्मक स्तर पर बदलाव किए गए.
5. एंटी-इंकम्बेंसी भी बनी वजह
केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलने का ट्रेंड रहा है, लेकिन इस बार एलडीएफ 10 साल से सत्ता में थी. ऐसे में सरकार के खिलाफ स्वाभाविक नाराजगी भी देखने को मिली. हालांकि यह नाराजगी बहुत तीखी नहीं थी, लेकिन बदलाव की इच्छा ने कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना दिया.