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तकनीक ऐसी कि बड़े-बड़े आर्किटेक्ट भी हो जाएंगे फेल...शख्स ने चूने और मिट्टी से तैयार किया खूबसूरत घर

दरअसल लखनऊ और आस-पास अवध के नवाबों के समय में बनी कई ऐसी इमारतें हैं जो आज भी उतनी ही ख़ूबसूरत और मज़बूत हैं. निशांत को पता चला कि इनमें से कई चूने और मिट्टी की बनी हैं. पुराने वस्तुशिल्प का अध्ययन बताता है कि लखनऊ में ऐसी इमारतें बनाने में माश (उड़द) की दाल और बेल का गूदा प्रयोग हुआ.

Nishant Upadhyay Nishant Upadhyay
हाइलाइट्स
  • बेल्जियम में रहकर भी किया काम

  • नहीं किया सीमेंट का प्रयोग

घर बनाना हर किसी का सपना होता है. लोग जब घर बनाते हैं तो चाहते हैं कि वो लम्बे समय तक मजबूत बना रहे. लेकिन लखनऊ के एक युवा आर्किटेक्ट ने चूने और मिट्टी से बनने वाले ऐसे घर का डिज़ाइन तैयार किया है जो इतना आरामदेह होगा कि गर्मी के मौसम में आपको राहत देगा और ठंड के मौसम में गर्मी का अहसास कराएगा. निशांत उपाध्याय इसी टेक्नोलॉजी पर भारत ही नहीं बेल्जियम में भी काम कर रहे हैं. UNESCO ने भी निशांत के प्रोजेक्ट को सराहा है.

नहीं किया सीमेंट का प्रयोग
पुरानी इमारतों में घंटो गुजारने और उनको देखने समझने का शौक तो निशांत को बचपन से था. लेकिन लखनऊ से आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने के बाद निशांत को लगा कि बढ़ते तापमान और गर्मी के बीच रहने के लिए लोग घर तो बना रहे है पर उनमें पहले जैसा सुकून नहीं है. गर्मी में शहर के घर और मकान और गर्म हो जाते हैं. ऐसे में निशांत ने इन इमारतों को समझना शुरू किया जो सालों साल पहले बने थे और आज भी मजबूती से खड़े हैं. निशांत ने चूने और मिट्टी से बने घर या भवन की कल्पना की जिसमें सीमेंट का प्रयोग न हो.

बेल्जियम में रहकर भी किया काम
दरअसल लखनऊ और आस-पास अवध के नवाबों के समय में बनी कई ऐसी इमारतें हैं जो आज भी उतनी ही ख़ूबसूरत और मज़बूत हैं. निशांत को पता चला कि इनमें से कई चूने और मिट्टी की बनी हैं. पुराने वस्तुशिल्प का अध्ययन बताता है कि लखनऊ में ऐसी इमारतें बनाने में माश (उड़द) की दाल और बेल का गूदा प्रयोग हुआ. निशांत ने इस बात को समझा और इसी तकनीक पर काम शुरू किया. इस बीच निशांत ने बेल्जियम रहकर काम किया. निशांत ने ऐसे मकानों का खाका तैयार किया. UNESCO ने उनके इस आइडिया और प्रोजेक्ट को मान्यता दी और निशांत को ऐतिहासिक इमारतों को पुरानी रंगत में लाने और उसको ध्यान में रखकर प्लानिंग का ज़िम्मा सौंपा. यानी heritage conservation के साथ डेवलेपमेंट कैसे हो निशांत इस बात के लिए UNESCO के साथ काम कर रहे हैं. निशांत ने खजुराहो में काम करते हुए इसी तकनीक पर कम्यूनिटी सेंटर का भवन बनाया है. आखिर क्या बात है कि सीमेंट का प्रयोग न करके चूने और मिट्टी से घर बनाना फायदेमंद हो सकता है.

मकान की खास बात 
निशांत कहते हैं कि आंगन, रोशनदान, झरोखे जैसी चीजें बनाकर हमारे पूर्वजों ने अपनी उन्नत आर्किटेक्चर का परिचय दिया. हम लोग उन्हीं के विज़्डम (wisdom)का प्रयोग क्यों न करें? विकास होना चाहिए पर heritage को ध्यान में रख कर.निशांत कहते हैं कि गर्मी में ठंडे और ठंड के मौसम में गर्माहट घर के डिज़ाइन में बदलाव कर काफ़ी हद तक लाया जा सकता है.

दरअसल ये कोशिश सिर्फ नया या नए तरीके के भवन बनाने की ही नहीं है बल्कि अपनी मिट्टी अपनी संस्कृति से जुड़ने की भी है. अब बहुत से लोग इस आइडिया से प्रभावित हो रहे हैं और ऐसा मकान बनाना चाहते हैं. जिन लोगों के घर या हवेली पुरानी है वो भी चाहते हैं कि ये खूबियां बनी रहें और इसी बात को ध्यान में रख कर घर की मरम्मत हो.