mashaal raas
mashaal raas
नवरात्रि में गुजरात की गलियों से लेकर बड़े-बड़े मैदानों तक गरबा और डांडिया की धूम देखने को मिलती है. रंग-बिरंगे कपड़े, ढोल की थाप और गोल घेरे में नाचते लोग इस त्योहार की रौनक बढ़ा देते हैं. लेकिन गुजरात के जामनगर में नवरात्रि के दौरान एक ऐसा अनोखा लोकनृत्य भी किया जाता है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं. इसे मशाल रास कहा जाता है. इस डांस में कलाकार हाथों में जलती हुई मशाल लेकर ताल से ताल मिलाते हैं. आग की लपटों के बीच उनका शानदार प्रदर्शन देखने वालों के लिए यादगार बन जाता है. तो चलिए आपको बताते हैं कि क्या है मशाल रास...
क्या है मशाल रास और कैसे किया जाता है यह डांस?
मशाल रास गुजरात का एक पारंपरिक लोक नृत्य है. इसका नाम गुजराती शब्द 'मशाल' से पड़ा है, जिसका मतलब जलती हुई मशाल होता है. इस नृत्य में आमतौर पर 12 पुरुष कलाकार हिस्सा लेते हैं. वे पारंपरिक गुजराती कपड़े केडियू-चोयणू पहनते हैं. इसमें छह कलाकार अंदर और छह बाहर के घेरे में खड़े होते हैं. सभी कलाकार हाथों में जलती मशाल लेकर एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाते हुए अलग-अलग आकृतियां बनाते हैं. उनके डांस में सथिया और त्रिशूल जैसी आकृतियां भी देखने को मिलती हैं. नृत्य का सबसे रोमांचक हिस्सा तब आता है, जब जमीन पर जलती हुई रुई की गोलियां रखी जाती हैं और कलाकार उनके ऊपर से छलांग लगाते हैं.
1957 से जुड़ा है मशाल रास का इतिहास
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जामनगर में मशाल रास की शुरुआत साल 1957 में श्री पटेल युवक गरबी मंडल से जुड़ी है. धीरे-धीरे यह नृत्य जामनगर और सौराष्ट्र क्षेत्र की खास पहचान बन गया. आज भी स्थानीय कलाकार और समुदाय इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. इस नृत्य के लिए काफी अभ्यास और एक-दूसरे के साथ तालमेल जरूरी होता है. आग के बीच प्रदर्शन करते समय कलाकारों को हर कदम बेहद सावधानी से उठाना पड़ता है. जरा सी चूक भी खतरनाक साबित हो सकती है.
मां दुर्गा की भक्ति से जुड़ा है यह नृत्य
मशाल रास सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी है. नवरात्रि के दौरान कलाकार भक्ति गीतों की धुन पर यह नृत्य करते हैं. 'रमती आवे माड़ी' जैसे गीतों के साथ कलाकार मां दुर्गा की आराधना करते हैं. नृत्य में बनने वाली आकृतियां और आग की लपटें इसे खास बनाती हैं.
गरबा और डांडिया से कितना अलग है मशाल रास?
गरबा में लोग गोल घेरे में पारंपरिक कदमों पर नाचते हैं, जबकि डांडिया में कलाकार लकड़ी की सजी हुई छड़ियों को आपस में टकराकर नृत्य करते हैं. वहीं, मशाल रास की सबसे बड़ी खासियत जलती हुई मशालों के साथ किया जाने वाला प्रदर्शन है. इसमें आग के बीच तालमेल, खास आकृतियां और जलती रुई के ऊपर छलांग लगाने जैसे करतब शामिल होते हैं.
गुजरात की यह अनोखी परंपरा दिखाती है कि नवरात्रि सिर्फ गरबा और डांडिया तक सीमित नहीं है. मशाल रास में लोककला, साहस और मां दुर्गा की भक्ति का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो इसे बाकी नृत्यों से अलग बनाता है.
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