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झुग्गी की महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, हजारों भूखों को भी मिल रहा सहारा, बड़े काम की है ये स्कीम

इस योजना के तहत मुंबई की झुग्गी बस्तियों में रहने वाली घरेलू महिलाएं अपने घरों में ही भोजन तैयार करती हैं. पहले ये महिलाएं किसी के घर झाड़ू-पोछा करने, बच्चों की मालिश करने या सिलाई का काम कर जैसे-तैसे अपने परिवार का खर्च चलाती थीं. लेकिन अब इस पहल से उन्हें सम्मानजनक काम मिला है और वे आर्थिक रूप से पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई हैं.

मुंबई जैसे महानगर में जहां एक ओर ऊंची इमारतें हैं, वहीं दूसरी ओर झुग्गी बस्तियों में संघर्ष भरी जिंदगी भी चलती है. इन्हीं बस्तियों में रहने वाली सैकड़ों महिलाओं के लिए एक पहल उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. इस पहल का नाम है 'मील्स फ्रॉम मां- रसोई से सड़क रोड', जो न सिर्फ महिलाओं को रोजगार दे रही है, बल्कि भूख से जूझ रहे जरूरतमंदों तक दो वक्त का खाना भी पहुंचा रही है.

इस योजना के तहत मुंबई की झुग्गी बस्तियों में रहने वाली घरेलू महिलाएं अपने घरों में ही भोजन तैयार करती हैं. पहले ये महिलाएं किसी के घर झाड़ू-पोछा करने, बच्चों की मालिश करने या सिलाई का काम कर जैसे-तैसे अपने परिवार का खर्च चलाती थीं. लेकिन अब इस पहल से उन्हें सम्मानजनक काम मिला है और वे आर्थिक रूप से पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई हैं.

इन महिलाओं द्वारा रोजाना करीब साढ़े तीन हजार भोजन पैकेट तैयार किए जाते हैं. ये भोजन उन लोगों तक पहुंचाया जाता है जिनका जीवन सड़कों पर ही गुजरता है. भोजन का पैकेट मिलते ही इनके चेहरों पर मुस्कान आ जाती है. कई जरूरतमंद तो रोज तय समय पर इन फूड पैकेट्स का इंतजार करते हैं. बता दें कि इस नेक काम की शुरुआत और संचालन डॉ. अनिल काशी मुरारका द्वारा किया जा रहा है. पिछले करीब 8 वर्षों से यह अभियान लगातार चल रहा है. एक ओर जहां झुग्गी बस्तियों की महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता मिल रही है, वहीं दूसरी ओर भूखे पेट सोने वालों को भरपेट भोजन.

'मील्स फ्रॉम मां' सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीयता की मिसाल है. यह पहल दिखाती है कि अगर सही दिशा और सोच हो, तो रसोई से भी क्रांति शुरू हो सकती है.

रिपोर्टर: धर्मेंद्र दूबे

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