scorecardresearch

LPG के बाद अब सरसों के तेल पर संकट, डिमांड और स्पलाई के बीच तालमेल मुश्किल, दाम बढ़ने के हैं आसार

भारत का खाद्य तेल उद्योग 55% विदेशी आयात पर निर्भर है, लेकिन युद्ध के कारण मलेशिया और अमेरिका से आने वाले पाम और सोयाबीन तेल की सप्लाई रुक गई है. इसका सीधा असर घरेलू सरसों तेल पर पड़ सकता है, और डिमांड के कारण दाम आसमान छू सकता है.

सरसों तेल पर संकट सरसों तेल पर संकट

खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध का असर अब सरसों के तेल पर भी नजर आने लगा है. विदेशों से आने वाले सोयाबीन, पाम आयल सहित अन्य सभी प्रकार के तेल की सप्लाई लगभग पूरी तरह से बंद हो चुकी है. ऐसे में बाजार में सरसों के तेल की मांग तेजी से बढ़ रही है और इसी कारण इसके दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं.

देश के कुल सरसों उत्पादन में राजस्थान अकेले 50% उत्पादन करता है. राजस्थान में सबसे ज्यादा उत्पादन अलवर, भरतपुर, झुंझुनू, सीकर, करौली और दौसा जिलों में होता है. सबसे अधिक सरसों तेल की मिलें अलवर में स्थित हैं और यहीं से पूरे देश में तेल की सप्लाई होती है. युद्ध के चलते सरसों के दाम अभी बढ़ रहे हैं, जिससे किसानों को राहत मिल रही है. हालांकि, अगर यही हालात आगे भी बने रहे तो बाजार में सरसों का तेल कम पड़ सकता है और इसकी कीमत कई गुना बढ़ सकती है.

सरसों की बढ़ती मांग और मंडी में सीधी आवक
राजस्थान में रबी की फसलों में सबसे अधिक बोई जाने वाली फसल सरसों है और वर्तमान हालातों में इसके दामों पर भी खाड़ी युद्ध का सीधा असर दिख रहा है. किसान अपने खेतों से सीधे सरसों की फसल को मंडी तक ला रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों से तेल का आयात लगभग बंद है, जिससे सरसों के तेल की मांग लगातार बनी हुई है.

किसानों को इस समय सरसों के दाम अच्छे मिल रहे हैं, जिससे वे काफी खुश हैं. वर्तमान में सरसों समर्थन मूल्य पर 6200 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है, जबकि खुले बाजार में भाव इससे अधिक हैं. इस बार सरसों की पैदावार भी बहुत अच्छी है.

उत्तम क्वालिटी की सरसों और तेल की अधिक मात्रा
राजस्थान खाद्य पदार्थ संघ के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश चंद्र अग्रवाल (जलालपुरिया) के अनुसार, खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध के कारण वहां से तेल का आयात नहीं हो रहा है, जिस वजह से किसानों की सरसों की फसल महंगे दामों पर बिक रही है. तेल मिलों को भी इसका लाभ मिल रहा है क्योंकि भारत में सरसों तेल की खपत सबसे अधिक है. इस कारण किसानों और व्यापारियों दोनों को फायदे की स्थिति बनी हुई है.

इस बार अलवर और भरतपुर, जो सरसों उत्पादक के सबसे बड़े जिले हैं, उनमें पैदावार भी अच्छी हुई है. इसके साथ ही, इस बार सरसों की क्वालिटी बेहतर है और जिसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा है. जहां सामान्यत औसतन 40% तेल निकलता है, वहीं इस बार 42-43% तेल निकल रहा है. यानी 100 किलो सरसों से 43 किलो तेल मिल रहा है. मंडी में लगातार सरसों की आवक बनी हुई है और रोजाना 35 से 40 हजार कट्टे सरसों आ रही है.

विदेशी तेल पर निर्भरता और मिलावट की संभावना
भारत में पाम तेल मलेशिया से और सोयाबीन रिफाइंड तेल अमेरिका से आता है. भारत का तेल उद्योग 55% विदेशों पर निर्भर है, जबकि यहां सिर्फ 45% तेल का उत्पादन होता है.

आम तौर पर कीमतों में अंतर के कारण सरसों के तेल में अन्य तेलों की मिलावट की आशंका बढ़ जाती है, और खाद्य तेलों की मिलावट पर सरकार की ओर से कोई कड़ी रोक अभी नहीं है. इसलिए बाजार में ऐसी मिलावट वाला तेल आसानी से बिक सकता है.

लेकिन इस समय तीनों तेलों के दाम लगभग बराबर हैं, जिससे मिलावट की संभावना कम है. चूंकि विदेशी तेल नहीं आ रहा, इसलिए भारत में सरसों तेल की मांग और बढ़ गई है और किसान भी इसे तेजी से बेच रहे हैं. इस समय सरसों के दाम 6800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं. किसानों का मानना है कि अगर खाड़ी देशों से तेल आयात फिर से शुरू हो गया, तो सरसों की डिमांड कम हो सकती है और उनको मिलने वाला दाम नीचे आ सकते हैं.

युद्ध लंबा खिंचा तो बढ़ सकते हैं दाम
संघ अध्यक्ष ने बताया कि यदि खाड़ी देशों का युद्ध लंबा चलता है, तो भारत में सरसों के दाम और बढ़ सकते हैं. फिलहाल जमाखोरी की आशंका कम है क्योंकि सरकार ने कई प्रतिबंध लगाए हुए हैं और वायदा व्यापार पर दो साल से रोक है, जिससे सटोरियों की भूमिका लगभग खत्म है.

पहले विदेशी तेल आने से देश में हमेशा करीब 10 लाख टन सरसों का स्टॉक रहता था, लेकिन इस बार युद्ध के चलते स्टॉक खत्म होने की आशंका है. इसके साथ ही डॉलर के महंगा होने से विदेशी तेल भी महंगा हो गया है. लंबा युद्ध आम जनता के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है.

वहीं सरकार लगातार सरसों पर एमएसपी बढ़ा रही है ताकि किसान तिलहन की बुवाई के लिए प्रेरित हों, खासकर सोयाबीन और सरसों की.
फिलहाल अलवर से सरसों तेल की सबसे ज्यादा सप्लाई बंगाल, असम और बिहार में होती है. इसी कारण अलवर सरसों तेल उत्पादन का सबसे बड़ा हब बन गया है.

(रिपोर्ट- हिमांशु शर्मा)

ये भी पढ़ें