Public Transport
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ऑफिस पहुंचने के लिए कोई बाइक या स्कूटर निकालता है, कोई बस पकड़ता है, तो कोई ऑटो का सहारा लेता है. लेकिन देश में काम पर जाने वाले लोगों का सबसे बड़ा भरोसा किस साधन पर है? इसका जवाब पहली बार हुए नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे यानी NHTS में मिला है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी NSO की ओर से जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच कराए गए इस सर्वे में 14,274 गांव और 10,377 शहरी ब्लॉक शामिल किए गए. करीब 4.92 लाख परिवारों के 20.34 लाख से ज्यादा लोगों से जानकारी जुटाई गई. सर्वे में रोजगार, पढ़ाई और दूसरी जरूरतों के लिए होने वाली यात्रा के पैटर्न को देखा गया है. इसमें 1 किलोमीटर से ज्यादा की यात्राओं को ट्रैवल के तौर पर गिना गया है.
काम पर जाने के लिए टू-व्हीलर सबसे आगे
सर्वे के मुताबिक 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के वर्कर्स में टू-व्हीलर काम पर जाने का सबसे बड़ा साधन है. देशभर में 42.6 फीसदी वर्कर्स फिक्स्ड वर्कप्लेस तक पहुंचने के लिए टू-व्हीलर का इस्तेमाल करते हैं. शहरी इलाकों में टू-व्हीलर की हिस्सेदारी 52.3 फीसदी है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 37.1 फीसदी वर्कर्स इससे काम पर जाते हैं. इसके बाद 28.3 फीसदी लोग पैदल और 10.7 फीसदी साइकिल से काम पर पहुंचते हैं. इससे पता चलता है कि ऑफिस आने-जाने में टू-व्हीलर की भूमिका देशभर में कितनी बड़ी है. खासकर शहरों में आधे से ज्यादा वर्कर्स अपने फिक्स्ड वर्कप्लेस तक पहुंचने के लिए टू-व्हीलर पर निर्भर हैं.
ऑफिस आने-जाने में हर महीने कितना खर्च?
रोज का ट्रैवल खर्च सीधे घर के बजट से जुड़ा है. NSO के मुताबिक फिक्स्ड वर्कप्लेस तक आने-जाने पर एक वर्कर का औसत मासिक खर्च 785 रुपये है. शहरों में ये खर्च काफी ज्यादा है. अर्बन वर्कर्स का औसत मासिक कम्यूट खर्च 1,044 रुपये है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 612 रुपये है. जेंडर के हिसाब से भी खर्च में अंतर दिखता है. पुरुष वर्कर्स का औसत मासिक कम्यूट खर्च 835 रुपये और महिला वर्कर्स का 533 रुपये है.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कितना?
बस, ऑटो और रेल-मेट्रो जैसे साधनों का इस्तेमाल भी काम पर जाने वाले लोग करते हैं. अलग-अलग ट्रांसपोर्ट modes के आंकड़ों को जोड़ने पर इनकी हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी बैठती है. हालांकि मास ट्रांजिट की तस्वीर अलग है. मेट्रो, मोनोरेल, सब-अर्बन रेल और ट्राम को मिलाकर अर्बन वर्कर्स के कम्यूट में इनकी हिस्सेदारी 5 फीसदी है. राज्यों में महाराष्ट्र में ये हिस्सेदारी 20.7 फीसदी है. पश्चिम बंगाल में 16.5 फीसदी और दिल्ली में 14.4 फीसदी है.
कितनी देर में पहुंचते हैं ऑफिस?
लंबे ट्रैफिक और बढ़ती भीड़ के बीच ज्यादातर वर्कर्स का कम्यूट टाइम 30 मिनट के अंदर है. NSO के मुताबिक 83.4 फीसदी वर्कर्स 30 मिनट से कम समय में अपने फिक्स्ड वर्कप्लेस पहुंच जाते हैं. देश में फिक्स्ड वर्कप्लेस तक पहुंचने का औसत ट्रैवल टाइम 25 मिनट है. ग्रामीण इलाकों में ये 23 मिनट और शहरी क्षेत्रों में 27 मिनट है. सुबह ऑफिस जाने के समय को लेकर भी सर्वे ने तस्वीर साफ की है. 94.9 फीसदी वर्कर्स सुबह 10 बजे से पहले अपने घर से निकल जाते हैं.
पढ़ाई के लिए कैसे सफर करते हैं बच्चे?
सर्वे में छात्रों की ट्रैवलिंग को भी शामिल किया गया है. 6 साल और उससे ज्यादा उम्र के 66.4 फीसदी छात्र अपने बेसिक कोर्स के एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन तक पहुंचने के लिए 1 किलोमीटर या उससे ज्यादा की यात्रा करते हैं. इन छात्रों में 37 फीसदी पैदल जाते हैं, 29.5 फीसदी बस का इस्तेमाल करते हैं और 15.8 फीसदी साइकिल से सफर करते हैं. वहीं 10.5 फीसदी छात्र ऑटो-रिक्शा से जाते हैं.
क्या बताता है NSO का सर्वे?
पहले ऑल इंडिया नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे ने देश की मोबिलिटी की एक बड़ी तस्वीर सामने रखी है. काम पर जाने वालों में टू-व्हीलर सबसे बड़ा कम्यूट साधन है, जबकि पैदल और साइकिल से सफर करने वालों की हिस्सेदारी भी काफी बड़ी है. साथ ही, ऑफिस आने-जाने का औसत मासिक खर्च 785 रुपये और औसत कम्यूट टाइम 25 मिनट है. ये आंकड़े देश में लोगों की रोजमर्रा की ट्रैवल जरूरत, खर्च और ट्रांसपोर्ट की पसंद को समझने के लिए अहम हैं.
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