mukhya mantri sehat yojna
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पटियाला के रहने वाले गुरपिंदर जीत सिंह की जिंदगी पांच महीने पहले ऐसे मोड़ पर आ गई, जहां हर रास्ता मुश्किल नजर आ रहा था. उनकी 65 वर्षीय मां बलजीत कौर धीरे-धीरे खाना-पीना छोड़ रही थीं और उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी. एक बेटे के लिए यह सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि हर दिन टूटती उम्मीदों का दर्द था. शुरुआत में गुरपिंदर ने निजी डॉक्टरों से इलाज करवाया. हालत में सुधार न होने पर वे राजिंदरा अस्पताल, पटियाला पहुंचे. यहां जांच और दवाइयों के बाद जो रिपोर्ट सामने आई, उसने परिवार को हिला कर रख दिया. बलजीत कौर को बच्चेदानी का कैंसर था.
मां की जान बचाने के लिए गुरपिंदर उन्हें संगरूर स्थित टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल ले गए. इलाज शुरू होते ही 60 से 65 हजार रुपये खर्च हो गए. एक साधारण ड्राइवर की कमाई के सामने यह रकम बहुत बड़ी थी. आर्थिक तंगी के कारण गुरपिंदर कर्ज लेने की सोचने लगे थे. इसी बीच अस्पताल में एक व्यक्ति ने उन्हें मुख्यमंत्री सेहत योजना के बारे में बताया. गुरपिंदर ने तुरंत रजिस्ट्रेशन कराया और कुछ ही समय में उन्हें स्मार्ट कार्ड मिल गया. इसके बाद इलाज का पूरा खर्च सरकार ने उठाया. महंगे टेस्ट, कीमोथेरेपी, दवाइयां, ऑपरेशन, आईसीयू और वेंटिलेटर तक का खर्च योजना के तहत कवर हुआ.
इलाज का पूरा खर्च सरकार ने उठाया
डॉक्टरों के लिए यह मामला चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि कैंसर बच्चेदानी से बढ़कर लीवर और फेफड़ों तक पहुंच चुका था. पहले तीन कीमोथेरेपी दी गई, लेकिन शरीर कमजोर होने के कारण दुष्प्रभाव हुए. इसके बाद धीरे-धीरे डोज कम करके नौ और कीमोथेरेपी दी गई. इलाज के बाद ट्यूमर एक जगह सीमित हो गया. इसके बाद करीब आठ घंटे लंबा ऑपरेशन कर उसे निकाला गया. ऑपरेशन के दौरान 35 से 40 टांके लगे. कुछ दिन आईसीयू और वेंटिलेटर पर रखने के बाद उन्हें वार्ड में शिफ्ट किया गया. आठ दिन बाद उनकी हालत में सुधार दिखने लगा.
8 लाख रुपये से ज्यादा खर्च बचा
गुरपिंदर हर समय मां के साथ रहे. उन्होंने दवाइयों से लेकर देखभाल तक हर जिम्मेदारी निभाई. डॉक्टरों के अनुसार पूरे इलाज पर 8 लाख रुपये से ज्यादा खर्च आया, जिसे योजना ने कवर किया. आज गुरपिंदर के चेहरे पर राहत है. वे कहते हैं कि अब उन्हें सुकून है कि उनकी मां बिना इलाज के नहीं मरेगी. यह कहानी सिर्फ एक इलाज की नहीं, बल्कि बेटे के संघर्ष, मां के प्रति उसके प्रेम और एक सरकारी योजना की ताकत की मिसाल है, जिसने एक परिवार को टूटने से बचा लिया.
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