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निकाय चुनाव में मिली हार पर कांग्रेस में हाहाकार, बीजेपी में भी शुरू हुआ मंथन, पंचायत चुनाव से पहले संगठन की कमजोरियां तलाशने की तैयारी

निकाय चुनाव में मिली हार पर कांग्रेस में हाहाकार, बीजेपी में भी शुरू हुआ मंथन, पंचायत चुनाव से पहले संगठन की कमजोरियां तलाशने की तैयारी राजस्थान के निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद अब भाजपा और कांग्रेस दोनों के भीतर मंथन का दौर शुरू हो गया है.

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निकाय चुनाव के बाद BJP-कांग्रेस में मंथन निकाय चुनाव के बाद BJP-कांग्रेस में मंथन

राजस्थान के निकाय चुनाव के नतीजों ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. बीजेपी ने जहां ज्यादातर निकायों में बोर्ड बनाने में सफलता हासिल की है, वहीं कांग्रेस कई ऐसे निकायों में भी सत्ता से दूर रह गई, जहां उसके पार्षदों की संख्या ज्यादा थी. अब दोनों दल चुनावी नतीजों के साथ-साथ बगावत, भीतरघात, टिकट बंटवारे और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल की भी समीक्षा कर रहे हैं. खास नजर आगामी पंचायत चुनाव पर है.

बीजेपी की जीत, लेकिन कमजोर कड़ियों की तलाश
निकाय चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई. घोषित नतीजों में बीजेपी ने 4,171 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस को 3,597 और निर्दलीयों को 2,272 वार्ड मिले. कई जगह निर्दलीयों की बड़ी संख्या ने बोर्ड बनाने का पूरा गणित बदल दिया. बोर्ड और चेयरपर्सन चुनाव में भी बीजेपी ने बढ़त बनाए रखी. 21 सितंबर तक घोषित नतीजों में बीजेपी ने 301 निकायों में से 197 में बोर्ड बनाए, जबकि कांग्रेस को 94 निकाय मिले. बाकी जगहों पर निर्दलीय और अन्य दलों के उम्मीदवार जीते. अब बीजेपी उन सीटों और इलाकों की समीक्षा कर रही है जहां पार्टी मजबूत होने के बावजूद अपेक्षित नतीजे नहीं मिले. प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कमजोर प्रदर्शन वाले क्षेत्रों में संगठन की समीक्षा के संकेत दिए हैं.

मुंडवा में बीजेपी के सामने बड़ा सवाल
नागौर की मुंडवा नगरपालिका का मामला बीजेपी के लिए खास चर्चा में है. यहां बीजेपी के 10 पार्षद थे और वह सबसे बड़ा दल था, लेकिन पार्टी की अधिकृत अध्यक्ष उम्मीदवार गीता देवी को एक भी वोट नहीं मिला. आरएलपी उम्मीदवार अलका देवी कंडोई को 13 वोट मिले, जबकि निर्दलीय घनश्याम सादावत को 12 वोट मिले. सादावत को बीजेपी से टिकट नहीं मिला था और बाद में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा. ऐसे मामलों से पार्टी के सामने बागी उम्मीदवारों, क्रॉस वोटिंग और स्थानीय स्तर पर तालमेल की चुनौती साफ हुई है.

कांग्रेस के सामने हार की वजह तलाशने की चुनौती
कांग्रेस के लिए तस्वीर ज्यादा मुश्किल है. अजमेर में कांग्रेस 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन मेयर चुनाव में बीजेपी की अनामिका शर्मा 43 वोट लेकर जीत गईं. इसी तरह पाली में कांग्रेस ने 29 वार्ड जीते, लेकिन बीजेपी की नमिता बुबकिया 33 वोट लेकर मेयर बनीं. कांग्रेस की अधिकृत उम्मीदवार को सिर्फ तीन वोट मिले, जबकि पार्टी की बागी राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले. धौलपुर में भी 27 कांग्रेस पार्षद होने के बावजूद पार्टी चेयरपर्सन का पद हासिल नहीं कर सकी. इन घटनाओं ने उम्मीदवार चयन और पार्षदों के बीच तालमेल पर सवाल खड़े किए हैं.

पंचायत चुनाव से पहले होगी संगठन की पड़ताल
निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस ने भी संगठन की समीक्षा शुरू कर दी है. पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने जयपुर में नेताओं के साथ चुनावी प्रदर्शन और आगे की रणनीति पर बैठक की. इसमें स्थानीय संगठन को मजबूत करने और पंचायत चुनाव की तैयारियों पर चर्चा हुई. अब दोनों दल बूथ से लेकर वार्ड और विधानसभा क्षेत्र तक प्रदर्शन का हिसाब देखेंगे. टिकट वितरण, बागी उम्मीदवार, निर्दलीयों का असर और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल जैसे मुद्दों की पड़ताल होगी. पंचायत चुनाव से पहले निकाय चुनाव की ये समीक्षा दोनों पार्टियों के लिए संगठन की कमजोर कड़ियों को पहचानने का अहम मौका बन गई है.

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