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Republic Day 2026: 15 अगस्त और 26 जनवरी को ध्वजारोहण के लिए होता है इस खास रस्सी का इस्तेमाल... जानें कैसे अटल जी से जुड़ा है इस परंपरा का इतिहास

क्या आप जानते हैं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी पर झंडा एक खास तरह के रस्सी से फहराया जाता है. जानें इस परंपरा का पूरा इतिहास.

लाल किला लाल किला
हाइलाइट्स
  • आजादी के साथ शुरू हुई ऐतिहासिक परंपरा

  • सेना पूरे सम्मान के साथ लेने आती है रस्सी

देश की शान तिरंग और उसे फहराने वाली वह खास रस्सी, जिसके बिना लाल किले की प्राचीर हो या इंडिया गेट, ध्वजारोहण संभव नहीं. बहुत कम लोग जानते हैं कि इस रस्सी के पीछे भी एक लंबी परंपरा और देशभक्ति की कहानी छिपी है. यह कहानी है दिल्ली के सदर बाजार में स्थित गोरखीमल धनपत राय जैन एंड कंपनी की, जो आजादी के बाद से लगातार ध्वजारोहण के लिए रस्सी उपलब्ध करा रही है.

आजादी के साथ शुरू हुई ऐतिहासिक परंपरा
हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को फहराए जाने वाले तिरंगे के लिए इस्तेमाल होने वाली यह खास रस्सी कोई नई व्यवस्था नहीं है. इसकी शुरुआत साल 1947 से ही हो गई थी. आजादी के पहले स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार यह रस्सी प्रधानमंत्री को भेजी गई थी. तभी से यह परंपरा बिना रुके चलती आ रही है. साल 1950 से गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति भवन से लेकर राजपथ तक तिरंगा फहराने के लिए भी इसी दुकान की रस्सी भेजी जाती है.

कब से मिलने लगी निशुल्क रस्सी
इस परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में नरेश चंद जैन तीसरी पीढ़ी के हैं. वे बताते हैं कि आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में रस्सी के लिए शुल्क लिया जाता था. लेकिन साल 2001 में, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तब पहली बार यह रस्सी पूरी तरह निशुल्क दी गई. इसके बाद से आज तक ध्वजारोहण के लिए दी जाने वाली रस्सी के लिए कोई पैसा नहीं लिया जाता. यह दुकान देश सेवा को कारोबार से ऊपर मानती है.

देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोग कर चुके हैं इस्तेमाल
अब तक कई प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति इस रस्सी का इस्तेमाल कर चुके हैं. इनमें अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह, नरेंद्र मोदी, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, प्रणव मुखर्जी, रामनाथ कोविंद और वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुरमू शामिल हैं.

सेना पूरे सम्मान के साथ लेने आती है रस्सी
हर बार रस्सी लेने के लिए सेना स्वयं दुकान पर पूरे सम्मान के साथ आती है. ध्वजारोहण के बाद सरकार इस रस्सी को वापस लौटा देती है. रस्सी को सुंदर पैकिंग में, सरकारी मुहर और प्रमाणपत्र के साथ लौटाया जाता है. पैकेट पर उस साल और उपयोग का पूरा विवरण लिखा होता है. इसके साथ ही आयोजन कराने वाली सेना की ओर से प्रशंसा पत्र भी दिया जाता है.

सिर्फ रस्सी नहीं, देशभक्ति की मिसाल
तिरंगे के साथ जुड़ी यह रस्सी सिर्फ एक धागा नहीं है. यह परंपरा, समर्पण और देशभक्ति की प्रतीक है. बिना किसी स्वार्थ के, सालों से निभाई जा रही यह सेवा दिखाती है कि देश के सम्मान में छोटे से छोटा योगदान भी कितना बड़ा हो सकता है.

 

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