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पहले मायावती, फ‍िर योगी और अब अख‍िलेश के खेवनहार बनने की भूम‍िका में....... स्वामी प्रसाद मौर्य

उन्होंने अगस्त 2016 में बसपा से बगावत करके पार्टी छोड़ दी. उन्होंने पार्टी पर पैसे लेकर टिकट बांटने का बड़ा आरोप लगाया था जिसका खंडन करने खुद मायावती आगे आईं थीं. इस बात से ही पता चलता है कि स्वामी प्रसाद के पास कितना बड़ा वोट बैंक है. पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना दल बनाने की कोशिश के साथ ही कई दलों से संपर्क साधा.

हाइलाइट्स
  • की है वकालत की पढ़ाई

  • थे मायावती के करीबी 

  • 2017 के चुनाव में भाजपा से मिलाया हाथ 

यूपी की राजनीति में बड़ी उथल पुथल की खबर है. योगी सरकार के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी का दामन छोड़ दिया और अखिलेश की साइकिल पर सवार हो चुके हैं. अखिलेश यादव ने खुद ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है और स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ आने वाले नेताओं का भी स्वागत किया है. स्वामी प्रसाद मौर्य ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को अपना इस्तीफा भेज दिया है. स्वामी प्रसाद मौर्य ने लिखा है- 'विपरीत परिस्थितयों में रह कर भी काम करता रहा लेकिन दलितों,पिछड़ों और बेरोजगार नौजवानों के लिए उपेक्षा देखते हुए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे रहा हूं.' स्वामी प्रसाद मौर्य को अंबेडकरवादी राजनीति का भी बड़ा चेहरा माना जा रहा है. आइए जानते हैं कि देश का राजनीतिक भविष्य तय करने वाले उत्तर प्रदेश की राजनीति में खलबली मचाने वाले ये कद्दावर नेता आखिर कौन हैं.

 की है वकालत की पढ़ाई

स्वामी प्रसाद मौर्य का 2 जनवरी 1954 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में जन्मे थे. उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से लॉ में स्नातक और एमए की डिग्री ली. मौर्य ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1980 में सक्रिय रूप से कदम रखा. वह पहले इलाहाबाद युवा लोकदल की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य बने और इसके बाद उन्होंने जून 1981 से 1989 तक इस कार्यसमिति में महामंत्री का पद संभाला. इसके बाद वह 1989 से 1991 तक यूपी लोकदल के मुख्य सचिव रहे. 1991 से 1995 तक मौर्य ने उत्तर प्रदेश जनता दल के महासचिव पद की जिम्मेदारी संभाली.

थे मायावती के करीबी 

2 जनवरी 1996 को स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा की सदस्यता ली और प्रदेश महासचिव बने. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 1996 में स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा के टिकट पर डलमऊ, रायबरेली से विधानसभा सदस्य बने. स्वामी प्रसाद बसपा में रहते हुए चार बार विधायक और पांच बार कैबिनेट मंत्री बने. इसके अलावा वह यूपी विधानसभा से तीन बार नेता प्रतिपक्ष भी चुने गए. मौर्य ने 2009 में पडरौना विधानसभा उपचुनाव जीता और केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह की मां को हराया. इसके बाद वो मायावती के करीबियों में गिने जाने लगे. मई 2002 से अगस्त 2003 तक के लिए उन्हें कैबिनेट में जगह मिली और अगस्त 2003 से सितंबर 2003 तक नेता प्रतिपक्ष रहे. जनवरी 2008 में उन्हें बसपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. 2012 में मिली हार के बाद मायावती ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया.

2017 के चुनाव में भाजपा से मिलाया हाथ 

उन्होंने अगस्त 2016 में बसपा से बगावत करके पार्टी छोड़ दी. उन्होंने पार्टी पर पैसे लेकर टिकट बांटने का बड़ा आरोप लगाया था जिसका खंडन करने खुद मायावती आगे आईं थीं. इस बात से ही पता चलता है कि स्वामी प्रसाद के पास कितना बड़ा वोट बैंक है. पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना दल बनाने की कोशिश के साथ ही कई दलों से संपर्क साधा. आखिरकार उन्हें बीजेपी का साथ मिल गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा की तरफ से  चुनाव लड़ा और जीत के बाद सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और तब से श्रम मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे थे.