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भारत में सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए उम्र तय होनी चाहिए? एक्सपर्ट्स से जानें

सोशल मीडिया और मोबाइल की बढ़ती लत बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है. संसद में भी ये मुद्दा उठा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों को डिजिटल लत से बचाने में फैमिली और स्कूल की अहम भूमिका हो सकती है.

Social Media Addiction Social Media Addiction

सोशल मीडिया और मोबाइल की बढ़ती लत बच्चों के बचपन को प्रभावित कर रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि स्क्रीन टाइम की अति बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास को बाधित कर रही है. संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जिसमें बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने और सोशल मीडिया पर उम्र की सीमा तय करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया.

संसद में उठा स्क्रीन टाइम का मुद्दा-
पिछले सप्ताह संसद में बच्चों के स्क्रीन टाइम और डिजिटल एडिक्शन पर चर्चा हुई. जेडीयू सांसद संजय झा ने सुझाव दिया कि स्मार्टफोन पर वैधानिक चेतावनी होनी चाहिए, जैसे तंबाकू उत्पादों पर होती है. आर्थिक सर्वे 2025-26 में भी डिजिटल एडिक्शन को बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताया गया.

भारत में कानून की आवश्यकता-
आंध्र प्रदेश और गोवा सरकारें सोशल मीडिया के इस्तेमाल को कंट्रोल करने के लिए सख्त कानून बनाने पर विचार कर रही हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि बच्चों को पढ़ाई और अच्छी आदतों की ओर प्रेरित करना चाहिए. विदेशों में भी इस पर सख्त कदम उठाए गए हैं. ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, चीन और स्पेन जैसे देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र की सीमा तय की गई है.

एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?
विशेषज्ञों ने बताया कि डिजिटल लत से बच्चों में एंजाइटी, डिप्रेशन और आत्मसम्मान की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. डॉक्टर डीके गुप्ता ने कहा कि भारत में हर चौथे बच्चे में एडीएसडी (अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर) के लक्षण देखे जा रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि डिजिटल लत के कारण बच्चों में मोटापा, डायबिटीज और अन्य शारीरिक समस्याएं बढ़ रही हैं.

फैमिली की अहम भूमिका- एक्सपर्ट
डॉक्टर जयंती ने कहा कि परिवार बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को कंट्रोल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. उन्होंने कहा कि पेरेंट्स को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और उनके स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए. विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि स्कूलों में साइकोलॉजिस्ट की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए.

डॉक्टर दीपक रहेजा ने कहा कि बैन से ज्यादा जरूरी है कि बच्चों के साथ संवाद और निगरानी बढ़ाई जाए. उन्होंने स्कूलों और परिवारों के बीच तालमेल बनाने पर जोर दिया. विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए कंटेंट मॉनिटरिंग और उम्र की सीमा तय की जाए.

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