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साउथ की फिल्म से आया आइडिया, दिन में ट्रेलर रात में चोरी का वाहन... एक ही रात में देते 2-3 घर में वारदात

राजस्थान में चोरों का ऐसा गिरोह हत्थे चढ़ा है, जो मालवाहक ट्रेलर का इस्तेमाल रात में चोरी के लिए करता था. उन्हें ऐसा करने का आइडिया एक साउथ की फिल्म से आया था. वह दो साल में 100 से ज्यादा वारदातों को अंजाम दे चुके थे.

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गिरफ्तार आरोपी गिरफ्तार आरोपी

राजस्थान में चोरी की वारदातों को अंजाम देने वाली एक ऐसी गैंग का खुलासा हुआ है, जिसने पुलिस को भी अपने काम करने के तरीके से हैरान कर दिया. पुलिस के मुताबिक गैंग के पांच सदस्य मालवाहक ट्रेलर को ही अपनी ‘चलती फिरती ढाल’ बनाकर वारदात करते थे. दिन में यही ट्रेलर हाईवे पर सामान्य मालवाहक वाहन नजर आता था और रात होते ही इसी के जरिए गैंग चोरी के लिए निकल पड़ती थी.

पुलिस के अनुसार गैंग ने करीब दो साल में 100 से ज्यादा वारदातें की हैं. शुरुआती पूछताछ में नागौर के अलावा डीडवाना-कुचामन, बीकानेर, जोधपुर और फलोदी इलाके में भी चोरी की वारदातें कबूल करने की बात सामने आई है. पुलिस अब फास्टैग, मोबाइल नंबर और ट्रेलर के पुराने रूट खंगालकर एक-एक वारदात को जोड़ने में जुटी है.

दक्षिण की फिल्म से मिला चोरी का आइडिया

पुलिस अधिकारी के मुताबिक गैंग के दो सदस्य शैतान और राजेंद्र बेहद शातिर हैं. ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद दोनों ने चोरी का पूरा तरीका बेहद योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया. पूछताछ में सामने आया कि दक्षिण भारत की एक फिल्म देखने के बाद उन्हें ट्रेलर के इस्तेमाल से चोरी करने का आइडिया आया.

गैंग मालवाहक ट्रेलर लेकर हाईवे किनारे किसी होटल पर रुकती थी. एक सदस्य ट्रेलर की निगरानी करता था, एक व्यक्ति गांव के बाहर रहता था, जबकि तीन सदस्य चोरी के लिए निकलते थे.

रेकी नहीं, अचानक चुनते थे घर

इस गैंग की सबसे बड़ी खासियत थी कि यह पहले से रेकी नहीं करती थी. पुलिस के अनुसार गैंग ऐसे घरों को निशाना बनाती थी, जहां लोग घर के बाहर या छत पर सो रहे हों.

चोर खिड़की, रोशनदान या सीढ़ियों का दरवाजा तोड़कर घर में घुसते थे. बंद मकान मिलने पर ताला तोड़ देते थे. अगर एक घर में बड़ी मात्रा में जेवर या नकदी मिल जाती तो दूसरे घर को छोड़ देते, लेकिन कम माल मिलने पर एक ही रात में दो-तीन घरों को निशाना बनाते थे.

ट्रेलर को पुलिस की नजर से बचाने की पूरी रणनीति

पुलिस के मुताबिक गैंग ने मालवाहक ट्रेलर का इस्तेमाल इसलिए किया क्योंकि नाकाबंदी के दौरान आमतौर पर छोटे वाहनों और बाइक पर ज्यादा शक किया जाता है. खाली ट्रेलर को पुलिस सामान्य वाहन समझकर आगे जाने देती थी.

गैंग हर दो-तीन महीने में ट्रेलर का फास्टैग बदल देती थी. ट्रेलर पर स्थानीय देवी-देवताओं और जातिगत नाम लिखवाए जाते थे, ताकि वह स्थानीय मालवाहक वाहन जैसा नजर आए. नंबर प्लेट नहीं बदली जाती थी, लेकिन चोरी के बाद रूट जरूर बदल दिया जाता था. एक ही रास्ते पर दोबारा जाने से पहले 20-25 दिन का अंतर रखा जाता था.

चोरी का माल कहां जाता था?

अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल चोरी के करोड़ों के जेवर और नकदी के नेटवर्क का है. अधिकारी के मुताबिक आरोपियों से अलग-अलग पूछताछ की जा रही है और कुछ ऐसे सुराग मिले हैं, जहां चोरी का सामान बेचे जाने की संभावना है.

पुलिस को आशंका है कि चोरी का इतना बड़ा माल किसी एक व्यक्ति के जरिए खपाना संभव नहीं है. ऐसे में गैंग के पीछे रिसीवर और मीडिएटर का बड़ा नेटवर्क होने की संभावना जताई जा रही है. पुलिस इस नेटवर्क की कड़ियां जोड़ रही है.

- केशा राम की रिपोर्ट