काशी में 6 पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार बना रहा कृष्ण की प्रिय बांसुरी
काशी में 6 पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार बना रहा कृष्ण की प्रिय बांसुरी
भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर पूरा गोकुल मंत्रमुग्ध हो जाता था. मान्यता है कि कृष्ण की बांसुरी में मां सरस्वती का वास था. आज भी बांसुरी के सुर लोगों को अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन काशी में बांसुरी की यही मधुर परंपरा सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनोखी कहानी भी कहती है. यहां एक मुस्लिम परिवार छह पीढ़ियों से बांसुरी बनाने और बेचने का काम कर रहा है.
काशी के अस्सी घाट पर बांसुरी की मधुर आवाज के साथ पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले मुश्ताक अहमद का परिवार पीढ़ियों से इस हुनर को संजोए हुए है. खास बात यह है कि मुश्ताक सिर्फ बांसुरी बेचते ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से काशी आने वाले पर्यटकों को बांसुरी बजाना निःशुल्क सिखाते भी हैं. यही वजह है कि घाट की बांसुरी उनके लिए रोजगार के साथ-साथ काशी की गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश भी बन गई है.
बांसुरी सीखने की नहीं लेते फीस
मुश्ताक अहमद बताते हैं कि उनका परिवार छह पीढ़ियों से काशी में बांसुरी बनाने और बेचने का काम कर रहा है. अस्सी घाट पर बांसुरी बेचकर परिवार की आजीविका चलती है. लेकिन इस हुनर को उन्होंने अपने तक सीमित नहीं रखा.
देश के अलग-अलग हिस्सों से काशी घूमने आने वाले लोग और विदेशी पर्यटक जब बांसुरी सीखने की इच्छा जताते हैं तो मुश्ताक उन्हें बांसुरी के सुर सिखाते हैं. इसके लिए वह कोई तय शुल्क नहीं लेते. सीखने के बाद कोई अपनी इच्छा से कुछ दे दे तो वह स्वीकार कर लेते हैं. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बांसुरी की शिक्षा लेने वाले कई विद्यार्थी भी उनके पास बांसुरी के बेसिक सुर और तकनीक की जानकारी लेने पहुंचते हैं.
काशी के घाट से मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान
मुश्ताक बताते हैं कि घाट पर बांसुरी बेचने के दौरान उन्होंने दुनिया के कई देशों से आए पर्यटकों को बांसुरी बजाना सिखाया. कई विदेशी पर्यटक उनसे बांसुरी सीखने के बाद अपने देश में स्टेज पर प्रस्तुति भी दे रहे हैं. उनके मुताबिक, दुनिया के कई देशों के लोगों को उन्होंने बिना किसी शुल्क के बांसुरी की शुरुआती शिक्षा दी है. उन्हें विदेश जाने का मौका भी मिला, लेकिन मां की तबीयत का हवाला देकर परिवार ने उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी.
जया जेटली के मंच से लेकर अजय जडेजा तक को सिखाई बांसुरी
मुश्ताक की बांसुरी की आवाज काशी के घाटों तक ही सीमित नहीं रही. वह बताते हैं कि दिल्ली में जया जेटली की ओर से उन्हें बांसुरी की प्रस्तुति के लिए बुलाया गया. वह लगातार कई बार वहां अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं. मुश्ताक के मुताबिक, जया जेटली के माध्यम से पूर्व क्रिकेटर अजय जडेजा को भी बांसुरी सिखाने का अवसर मिला. उनका कहना है कि कई ऐसे सेलिब्रिटी भी उनके पास आए, जिन्हें वह खुद पहचान नहीं पाए, लेकिन उन्होंने उन्हें बांसुरी बजाना जरूर सिखाया.
'रांझणा' फिल्म में भी गूंजी बांसुरी की धुन
काशी फिल्मकारों की पसंदीदा जगह रही है. देश-विदेश से फिल्म निर्माता और निर्देशक यहां शूटिंग करने पहुंचते हैं. मुश्ताक बताते हैं कि इसी दौरान उन्हें कई फिल्मों के लिए बांसुरी की धुन देने का अवसर मिला. फिल्म 'रांझणा' में भी उनकी बांसुरी की धुन का इस्तेमाल किया गया. हालांकि उनका दर्द यह है कि फिल्मों में उनकी धुन तो सुनाई देती है, लेकिन कई बार उनके नाम का उल्लेख नहीं किया जाता.
असम के खास बांस से तैयार होती है सुरों की बांसुरी
एक अच्छी बांसुरी तैयार करना आसान नहीं है. मुश्ताक बताते हैं कि इसके लिए खास तौर पर असम से बांस मंगाया जाता है. बांस को पहले काटकर उसकी नाप की जाती है. इसके बाद लोहे की ताप से इसकी सिकाई की जाती है. फिर बेहद सावधानी से सुरों के मुताबिक छेद किए जाते हैं. इसके बाद बांसुरी की पॉलिश होती है और उसके सुरों की जांच की जाती है. कई चरणों से गुजरने के बाद एक बांस का टुकड़ा मधुर सुरों वाली बांसुरी का रूप लेता है.
तीन महीने में बनती हैं सिर्फ 100 बांसुरियां
मुश्ताक बताते हैं कि बांसुरी बनाने में काफी मेहनत और समय लगता है. करीब तीन महीने में 100 बांसुरियां ही तैयार हो पाती हैं. इसे तैयार करने में परिवार के सदस्य मिलकर काम करते हैं. मुश्ताक, उनके दो बेटे, पत्नी और बहू मिलकर इस पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं. यानी एक बांसुरी में सिर्फ बांस नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मेहनत और कई पीढ़ियों का अनुभव शामिल होता है.
16 से 42 इंच तक की होती हैं बांसुरियां
मुश्ताक के मुताबिक किसी भी संगीत में सात मूल सुर होते हैं और संगीत में अलग-अलग स्केल के हिसाब से बांसुरियों की जरूरत होती है. कलाकार के स्तर और जरूरत के अनुसार बांसुरी का आकार और सुर अलग हो सकते हैं. उनके यहां 16 इंच से लेकर 42 इंच तक की बांसुरी तैयार होती है. अधिकतर कलाकार करीब 32 इंच तक की बांसुरी बजाते हैं, जबकि बड़े और अनुभवी बांसुरी वादक इससे बड़ी बांसुरी का इस्तेमाल करते हैं. उनका कहना है कि बांसुरी की कोई एक तय कीमत नहीं होती. कलाकार को जो बांसुरी पसंद आती है, उसकी गुणवत्ता और सुर के हिसाब से उसकी कीमत तय होती है.
10 साल की उम्र से बांसुरी बना रहे इश्तियाक
मुश्ताक के बेटे इश्तियाक अहमद भी अपने पिता के साथ इस पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा रहे हैं. वह बताते हैं कि बचपन से ही उन्होंने पिता को बांसुरी बनाते देखा. महज 10 साल की उम्र से वह माता-पिता के साथ बांसुरी बनाने में हाथ बंटाने लगे. मुश्ताक की बहू भी अब इस हुनर का हिस्सा बन चुकी हैं. वह बताती हैं कि शादी के बाद जब वह इस परिवार में आईं तो उन्हें बांसुरी बनाने के बारे में कुछ जानकारी नहीं थी. लेकिन पति और ससुर से सीखते-सीखते अब वह भी बांसुरी बनाने में सहयोग करती हैं.
काशी के घाट पर गूंजते सुर, जो धर्म की सीमाओं से परे हैं
काशी के अस्सी घाट पर जब मुश्ताक की बांसुरी से सुर निकलते हैं तो उसे सुनने वालों के लिए यह मायने नहीं रखता कि बांसुरी बनाने वाला किस धर्म से है. सुर की कोई जाति और मजहब नहीं होता. छह पीढ़ियों से एक मुस्लिम परिवार द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय बांसुरी को गढ़ना और दुनिया भर के लोगों को उसके सुर सिखाना, काशी की उस गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है जहां कला, संस्कृति और संगीत इंसान को इंसान से जोड़ते हैं.
रिपोर्टर: सुरेन्द्र कुमार गुप्ता
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