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ऑफबीट

World's Largest Flower: 3 फीट बड़ा, 14 किलो वजन… ये है दुनिया का सबसे बड़ा फूल, सड़े हुए मांस जैसी आती है गंध

Rafflesia Arnoldii
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दुनिया में फूलों की लाखों प्रजातियां हैं, लेकिन एक ऐसा फूल भी है जो अपने विशाल आकार और अजीब गंध के कारण पूरी दुनिया में मशहूर है. इसका नाम रैफ्लेशिया अर्नोल्डी है. यह दुनिया का सबसे बड़ा एकल फूल माना जाता है. इसका आकार जितना बड़ा है, उतनी ही अनोखी इसकी बनावट और जीवनशैली भी है. यह फूल न तो किसी आम पौधे की तरह जड़, तना और पत्तियां रखता है और न ही लंबे समय तक खिला रहता है. आइए जानते हैं इस अनोखे फूल की खास बातें.
 

Rafflesia Arnoldii
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ब्रिटिश सर्जन के नाम पर रखा गया नाम
दुनियाभर में करीब 4 लाख तरह के फूल पाए जाते हैं, लेकिन रैफ्लेशिया अर्नोल्डी सबसे अलग माना जाता है. इसका नाम ब्रिटिश सर्जन जोसेफ अर्नोल्ड के नाम पर रखा गया. उन्होंने साल 1818 में इस फूल के नमूने का अध्ययन किया था. अपने विशाल आकार की वजह से इसे दुनिया का सबसे बड़ा फूल कहा जाता है.

Rafflesia Arnoldii
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11 किलो तक वजन
रैफ्लेशिया अर्नोल्डी का व्यास लगभग 1 मीटर यानी 3 फीट 3 इंच तक हो सकता है. इसका वजन 11 किलोग्राम तक पहुंच सकता है. इस फूल में पांच मोटी लाल-भूरे रंग की पंखुड़ियां होती हैं, जिन पर सफेद धब्बे दिखाई देते हैं. इसका जीवन चक्र लगभग एक साल का होता है, लेकिन खिलने के बाद यह केवल 5 से 7 दिनों तक ही ताजा रहता है. इसके बाद यह मुरझा जाता है.

Rafflesia Arnoldii
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कहां पाया जाता है यह अनोखा फूल
यह फूल मुख्य रूप से इंडोनेशिया के वर्षावनों में पाया जाता है. खासकर बोर्नियो और सुमात्रा द्वीप इसके प्राकृतिक आवास हैं. यह जंगल के उन हिस्सों में उगता है, जहां नमी ज्यादा और धूप कम पहुंचती है. इसकी तेज दुर्गंध के कारण इसे 'शव फूल' भी कहा जाता है.

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सड़े हुए मांस जैसी क्यों आती है गंध
रैफ्लेशिया अर्नोल्डी से सड़े हुए मांस जैसी तेज गंध निकलती है. यह गंध मक्खियों और दूसरे कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे इसका परागण हो सके. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस गंध के पीछे डाइमिथाइल डाइसल्फाइड और डाइमिथाइल ट्राइसल्फाइड जैसे रसायन जिम्मेदार होते हैं.

Rafflesia Arnoldii
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न जड़, न तना और न पत्तियां
इस फूल की सबसे अनोखी बात यह है कि इसमें जड़, तना और पत्तियां नहीं होतीं. यह खुद भोजन नहीं बनाता, बल्कि टेट्रास्टिग्मा यानी जंगली अंगूर की बेल पर परजीवी की तरह उगता है और उसी से पोषण प्राप्त करता है. यही वजह है कि इसे दक्षिण-पूर्व एशिया के वर्षावनों के बाहर उगाना लगभग असंभव माना जाता है.