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बैंकर ने कुछ यूं सीखी सेब की खेती...पहले एक जमीन खरीदकर खुद की प्रैक्टिस अब लोगों को दे रहे ट्रेनिंग

हिमाचल के रहने वाले विक्रम ने एडवांस और नई तकनीक के बारे में समझने के लिए खुद भूमि खरीदी और फिर उस भूमि पर बगीचा स्थापित किया. उनका मानना था कि अगर कोई बागवान उनसे सवाल करेगा तो वो उसे कैसे समझाएंगे इसलिए किसान बनना जरूरी था.

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हाइलाइट्स
  • बगीचा खरीदकर खुद शुरू की खेती

  • लोगों को किया जागरूक

फलों की टोकरी कहा जाने वाला हिमाचल प्रदेश सेब उत्पादन के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. यहां सेब बागवानी को शुरू हुए एक सदी से भी उपर का समय हो चुका है लेकिन पंरपरागत रूप से हो रही सेब बागवानी से उत्पादन में उतनी बढ़ोतरी नहीं हो पाई है जितनी की विदेशों में हो रही है. विदेशों में हो रहे सेब उत्पादन का मुकाबला करने के लिए दो दशक पहले बैंक में नौकरी करने वाले विक्रम रावत ने प्रदेश में पहली बार रूट स्टॉक और हाई डेंसिटी एपल्स का कांसेप्ट लाए. इससे बागवानों को सेब की नए वैरायटी के साथ साथ अच्छी खासी आमदनी में भी बढ़ोतरी होनी लगी. लेकिन बैंकर से बागवान बनने उनका ये सफर इतना आसान नहीं था. उन्हें इसके लिए अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

लोगों को किया जागरूक
विक्रम को सेब के बारे में कोई जानकारी नहीं थी बावजूद इसके बागवानी के क्षेत्र में बदलाव लाने और कुछ नया सीखने की ललक के चलते विक्रम रावत ने सेब बागवानी में न सिर्फ महारत हासिल की बल्कि इसे हजारों किसानों तक पहुंचाकर उनकी जिंदगियों को बदलने का काम भी किया है. अब करसोग स्थित कलासन नर्सरी से हर साल प्रदेश भर के हज़ारों किसान विकसित सेब की प्रजाति तो ले ही जाते हैं, साथ ही किस तरह से कम समय में सेब का पौधा ज्यादा पैदवार दे, उसके बारे में भी बागवानों को लगतार जागरूक करवाते रहते हैं.

तैयार की सेब की नई किस्म
इन सेबों को देखकर आपको लगेगा की इस वक्त आप इजराइल के किसी सेब के बाग में खड़े हैं. लेकिन यह कोई विदेश में स्थित बगीचा नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले में करसोग ब्लॉक में  कलासन गांव है, जहां पर पिछले दो दशकों से विक्रम रावत लगतार अपनी मेहनत से इस बगीचे को सींच रहे हैं और उच्च उत्पादन वाली नई सेब की किस्म को तैयार कर रहे हैं. पिछले कई दशकों से परंपरागत सेब की वही किस्म और तरीके को भी विक्रम रावत ने बागवानों को जागरूक करके बदला है जिससे बागवान को फायदा हो सके और उसे अच्छी किस्म का सेब का पौधा मिल सके.

बगीचा खरीदकर खुद शुरू की खेती
विक्रम रावत ने इंडिया टुडे से ख़ास बातचीत में बताया की हिमाचल प्रदेश में लोग ट्रेडिशनल सेब की खेती कर रहे थे. उनके लिए एडवांस और नई तकनीक के बारे में समझाना बहुत मुश्किल था क्योंकी बागवान सबसे पहले यही पूछता था की जब आप पेशे से बैंकर हैं आपको सेब की कोई जानकारी नहीं. इसलिए बागवानों को समझाने के लिए सबसे पहले उन्होंने खुद एक चुनौतिपूर्वक क्षेत्र में भूमि खरीदी और फिर उस भूमि पर बगीचा स्थापित किया. विक्रम रावत बताते है की वर्ष 2000 की बात है उस समय उन्होंने नया नया कंप्यूटर खरीदा था.  एक बार अपने किसी बागवन मित्र से उन्होंने पूछा की इस बार अपने बगीचे के सेब नहीं खिलाए तो उनके मित्र ने जवाब दिया कि पिछले दो वर्षों से उनके बगीचे में सेब कम हो रहा है. बस वहीं से उनके जीवन में टर्निंग पॉइंट आया. इस बीच कंप्यूटर पर surfing करते हुए उन्हें पता चला नए तकनीक रूट स्टॉक और हाई डेंसिटी एपल्स के बारे में. लेकिन जब ये बात अपने दोस्त और बागवानों को समझाने की कोशिश की तो वो नहीं माने और कहा की तुम बैंकर हो तुम्हें इसकी जानकारी और समझ नहीं.

ऑनलाइन सीखा पूरा प्रोसेस
बस उस दिन के बाद पहले मैंने सोचा की बागवानों को समझाने से पहले क्यों न ज़मीन ली जाए और demonstration करके उनको बताया जाए. शौकिया तरीके से पहले मैंने खुद कंप्यूटर से सेब के बारे में पढ़ा और फिर उसे उगाने के लिए जो ज़मीन ली थी वहां पर प्रयोग करता रहा. सबसे पहले उन्होंने सेब की ग्राफ्टिंग और canopy management को सीखा. क्योंकि सेब के कारोबार में हिमाचल में कई पीढ़ियां काम कर रही थीं तो सबसे पहले उन्होंने अमेरिका से रूट स्टॉक का germ plasma मंगवाया और फिर पटियाला में इंजीनियरिंग कॉलेज में उसका मल्टिप्लिकेशन करवाया.

कई बार हुए फेल
विक्रम रावत बताते है की क्योंकि शुरुआती ज्ञान किताबों और कंप्यूटर से हासिल किया था तो कई बार फेल भी हुआ पर हिम्मत नहीं हारी और लगभग सात वर्षों की मेहनत के बाद रूट स्टॉक और हाई डेंसिटी एपल्स को जो तैयार किया था उसका परिणाम आने लगा. धीरे धीरे पूरे प्रदेश में बागवान परंपरागत सेब की खेती को अब नए advanced तरीके से तैयार करने लगे. सेब का पौधा 20 फ़ीट का होता है उसके अलावा टोपोग्राफी भी अहम होती है तो साइंटिस्ट हमेशा यही मानते थे की प्रदेश में रूट स्टॉक और हाई डेंसिटी एपल्स मुश्किल है. परम्परागत सेब के पेड़ पांच से छह साल में फल देते थे पर एक साल में ही फल देने वाले इन पौधों ने हिमाचल में एक नई क्रांति पेश की.

पौधे ने दूसरे से तीसरे साल में फल देना शुरू कर दिया. इस तरह से जो पौधा तैयार किया जाता है उसमें बीमारी कम लगने का खतरा रहता है.

लगाए स्पेशल सेंसर्स
विक्रम रावत बताते है की अब सेब के पौधों की देखभाल के लिए उन्होंने नर्सरी और पूरे बगीचे को पूरी तरह से ऑटोमेशन कर दिया है क्योंकि नर्सरी में लगभग 15 हजार पौधे हैं तो एक इंसान को उसे संभाल पाना मुश्किल है. अब उसे संभालने के लिए पूरी नर्सरी में सेंसर्स लगाए गए है जिससे रोबोट के जरिए पता चल जाए कि किस जगह पर पानी की कमी है, कहां खाद देनी है जिससे पूरी एडवांस्ड तरीके से बगीचे को संभाला जा सके.

दी जाती है ट्रेनिंग
विक्रम रावत अब हिमाचल के साथ उत्तराखंड में भी सेब बागवानी को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं. वो उतराखंड में सेब बागवानी के कई नए मॉडल खड़े कर चुके हैं. विक्रम रावत की पत्नी रजनी रावत इंडिया टुडे को बताती हैं कि हमारे यहां बहुत से बागवान सेब बागवानी को सीखने के लिए आते हैं और उन्हें उनकी भूमि की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार सेब की किस्मों को लगाने का राय के साथ प्लांटिंग मेटेरियल भी दिया जाता है. इसके साथ बाग लगाने के दौरान क्या सावधानियां बरतनी चाहिए इसकी भी पूरी जानकारी दी जाती है. विक्रम रावत अब हिमाचल और उतराखंड में सेब बागवानी को बढ़ाने के लिए अक्कसर दौरे पर रहते हैं ऐसे में उनकी अनुपस्थिति में उनकी बेटियां वसूधा रावत और चेष्टा रावत बाग की देखरेख करती हैं. उनकी बेटियों ने बताया कि वे बागवानी में विशेष लगाव रखती हैं और भविष्य में बागवानी क्षेत्र को ही अपने करियर के रूप आगे बढ़ांएगी.