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International Women’s Day Special: सामाजिक विरोध को पीछे छोड़ हजारों महिलाओं को दिखा रही हैं स्वरोजगार की राह, पढ़ें फैशन डिज़ाइनर रूमा देवी का शून्य से शिखर तक का सफर

GNT डिजिटल से बातचीत में 32 साल की रूमा देवी बताती हैं कि बेहद छोटी सी उम्र में उनकी मां गुजर गई थी. फिर उनकी शादी हो गई थी. घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बीमारी के चलते अपने बच्चे को नहीं बचा सके. तब वे अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी. लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और मुश्किलों से हार नहीं मानी.

रूमा देवी रूमा देवी
हाइलाइट्स
  • आर्थिक तंगी के चलते बच्चे को नहीं बचा पाईं

  • 2018 में मिला नारी शक्ति सम्मान पुरस्कार

कहते हैं जब महिलाएं जज़्बात के धागे चुनकर हुनर की सुई में पिरोकर, हाथों से अपने सपने बुनती हैं तब वो जो कपड़ा बनता है वो केवल उन्हें ही नहीं बल्कि आसपास वालों को भी अपने अंदर पनाह दे देता है. आज ऐसी न जाने कितनी महिलाएं हैं जो केवल अपने ही नहीं बल्कि दूसरों के सपने भी पूरे करने में लगी हुई हैं. इंटरनेशनल विमेंस डे (International Women's Day 2022) के मौके पर GNT डिजिटल ने एक ऐसी ही फैशन डिज़ाइनर से बात की जो आज हजारों महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर दे रही हैं. 

ये और कोई नहीं बल्कि एक असम्भव सोच को हिम्मत के धागों में पिरोने वाली, बाड़मेर की पारंपरिक कला को गांव की दर-ओ-दीवार से बाहर निकालने वाली, सामाजिक विरोध को पीछे छोड़कर हजारों महिलाओं को स्वरोजगार की राह दिखाने वाली बाड़मेर की फैशन डिज़ाइनर रूमा देवी (Ruma Devi) हैं.

GNT डिजिटल से बातचीत में 32 साल की रूमा देवी बताती हैं कि बेहद छोटी सी उम्र में उनकी मां गुजर गई थी. फिर उनकी शादी हो गई थी. घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बीमारी के चलते अपने बच्चे को नहीं बचा सके. तब वे अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी.  लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और मुश्किलों से हार नहीं मानी. 

वे कहती हैं, “2008 में कशीदाकारी का काम शुरू किया था. ये काम इसलिए शुरू किया था क्योंकि बचपन में जब मैं 4 साल की थी तो मेरी मां गुजर गई थी, फिर पिताजी की भी दूसरी शादी हो गई. आठवीं में स्कूल छूट गया, इसके बाद मैंने दादी के साथ बैठकर कशीदाकारी का काम सीखा. उस वक़्त हर घर में कशीदाकारी का काम होता था. हर मां अपनी बेटी को कुछ न कुछ बनाकर देती ही थी. तब मैंने देखकर ये काम सीख लिया.” 

आर्थिक तंगी के चलते बच्चे को नहीं बचा पाईं  

वे आगे कहती हैं, “जब मैं 17 साल की थी तो शादी हो गई. हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. इतनी की जब मेरा बच्चा हुआ तो वो बीमार हो गया. अच्छे हॉस्पिटल में इलाज करवाने के पैसे नहीं थे, जिसके चलते मैं उसे बचा नहीं पाई. एक समय आया जब मुझे नेगेटिव विचार भी आने लगे. मुझे लगता था कि अब मैं जीकर क्या करूं? पहले मम्मी को खो दिया, अब बच्चे को खो दिया. तब मैंने सोचा कि मैं कुछ ऐसा करूं जिससे मेरा मन भी लगा रहे और उससे मेरे हाथ में कुछ पैसे भी आते रहें. लेकिन उस टाइम सबसे बड़ी दिक्क्त थी कि काम क्या किया जाए? या तो कंस्ट्रक्शन का काम था या किसी के घर में झाड़ू-पोछा करूं. तब मैंने सोचा कि क्यों न जो बचपन में दादी से सीखा है काशीदारी उसी को काम बनाया जाए. इससे ये फायदा हुआ कि मैंने बैग बनाने शुरू किए. जो महिलाएं अपने मायके जाती थीं उन्हें बैग बनाकर दिए वो इसमें सामान रखकर ले जाया करती थी.” 

रूमा देवी अपने परिवार के साथ
रूमा देवी अपने परिवार के साथ (फोटो: सोशल मीडिया)

100-100 रुपये जोड़कर खरीदी सिलाई मशीन 

बता दें, रूमा देवी ने 2006 में 10 महिलाओं के साथ मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाया. और यहां से उनका सफर शुरू हुआ. हालांकि इसे शुरू करने में काफी दिक्कत थी. वे बताती हैं, “एम्ब्रायडरी का काम तो मैंने सुई और धागे से कर लिया था, लेकिन उसमें स्टिचिंग के लिए मशीन की जरूरत थी. मेरे पास न तो मशीन थी और न ही इतने पैसे. तब मुझे लगा कि अगर मुझे इतनी दिक्कत हो रही हैं तो मेरी जैसी कितनी ही बहने होंगी जिन्हें इन सब परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा. मैंने फिर अड़ोस-पड़ोस की बहनों से बात कि और कहा कि मैं अकेले नहीं कर पा रही हूं अगर हम साथ मिलकर करेंगे तो आसानी से कर लेंगे. तब हमने एक समूह बनाया और 100-100 रुपये इकठ्ठा करके मशीन खरीदी और फिर हमने ये काम शुरू किया.”

लेकिन इसके बाद उन्होंने सोचा कि 10 महिलाओं को कौन काम देगा? ऐस में उन्हें जानकारी मिली कि बाड़मेर में ग्रामीण विकास चेतना संस्थान में हैंडीक्राफ्ट तैयार करने का काम होता है, वहां उन्हें काम मिल सकता है. वहां जाकर सबसे पहले उन्हें सैम्पलिंग का काम मिला. उन्होंने तीन दिन के ऑर्डर को एक रात में ही पूरा कर दिया. जिसे सभी काफी प्रभावित हुए और आगे से एक के बाद एक उन्हें सैम्पलिंग के ऑर्डर मिलने लगे.

महिलाओं को दिखा रही हैं स्वरोजगार की राह,
महिलाओं को दिखा रही हैं स्वरोजगार की राह

अब लोग करने लगे हैं भरोसा 

रूमा देवी ने बताया कि पहले लोग उनसे सवाल करते थे, लेकिन अब सभी उनपर भरोसा करने लगे हैं. वे कहती हैं, “पहले जब वे लोग महिलाओं के घर पर जाते थे कि हमसे जुड़िये और उनके घर वाले मना कर देते थे, कहते थे कि पता नहीं आप इन्हें क्या सिखाएंगी, कल इन्हें कहीं जाने के लिए कहेंगी और कहते थे कि अभी ये जो कर रही हैं वही ठीक है. लेकिन हम जब महिला से बात करते थे, तो लगता था कि नहीं ये करना चाहती हैं. तब हम घरवालों को समझाते थे. ऐसे कर करके महिलाओं को जोड़ा है. आज की बात करें तो सभी जाने के लिए हैं.”

वे बताती हैं कि आज जब दिल्ली में एक्सिबिशन के लिए तैयार होना होता है तो एक को बोलो तो 10 तैयार हो जाती हैं. ये बदलाव आया है. आज  महिला के हाथ में पैसे हैं. महिला के पास खुद के हाथ में पैसे होते हैं तो वो ज्यादा आज़ाद महसूस करती है. जो चाहती है वो कर पाती है. वो आज अपनी बेटियों को पढ़ाने की कोशिश कर रही हैं. क्योंकि वो नहीं चाहती कि जिस तरह वो अनपढ़ रही, उनकी बेटी भी अनपढ़ रहे.”

रूमा देवी का शून्य से शिखर तक का सफर
रूमा देवी का शून्य से शिखर तक का सफर

सफर में आई काफी मुश्किलें 

रूमा देवी अपने पूरे सफर में मुश्किलों के बारे में बताती हैं. वे कहती हैं, “सफर आसान नहीं था. जब शुरू किया था तो काफी सवाल पूछे जाते थे. आस-पड़ोस के लोग कहते थे कि इनकी बहु कहां जा रही है? क्या काम कर रही है? किसके साथ जा रही है? लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी, क्योंकि मैं सही काम रही थी. मुझे पता था मैं कुछ गलत नहीं कर रही हूं. जब कुछ गलत नहीं कर रहे हैं तो सही यही होता है कि उनकी बातों को न सुनें और आगे बढ़ते जाएं.”

वे आगे कहती हैं कि आज हम सक्षम हैं तो सभी लोग हमारे साथ में खड़े हुए हैं. शुरुआत में विरोध तो होता ही है, लेकिन हमें बढ़ते जाना चाहिए. मैंने जब काम शुरू किया था तो घर से अलग एक रूम लेकर रहती थी, वहां से काम करती थी. लेकिन जब कुछ बन गई तो फिर परिवार के साथ में ही रहने लगी. इसलिए हमें पता होना चाहिए कि हमेशा परिवार को  भी साथ लेकर चलना चाहिए. मैंने कभी सोचा नहीं कि मैं रुकूंगी. जब भी हमारे आमने कोई दिक्कत आई तो हमने उससे सीख ली और आगे बढ़ते चले गए.

2018 में नारी शक्ति सम्मान पुरस्कार

रूमा देवी को 2018 में नारी शक्ति पुरस्कार से नवाजा गया था. इसके बारे में वे कहती हैं, “जब शुरुआत में हमें जिला कलेक्टर जी के हाथों पुरस्कार मिला तो हमें तो हमें बहुत अच्छा लगा, फिर हमारे राज्यपाल जी ने हमें सम्मान दिया तब लगा कि और अच्छा करना है. और फिर जब राष्ट्रपति जी के हाथों अवार्ड मिला तो ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. पहले जब दिल्ली जाते थे तो दूर से राष्ट्रपति भवन देखते थे, लेकिन उनके हाथों से अंदर जाकर सम्मान लेना बहुत गर्व की बात है. जब-जब नया अवार्ड मिला तब तब लगा कि ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है और हमें और भी अच्छा करना है. जब मेरे पास सबसे पहले फोन आया कि आपको राष्ट्रपति अवार्ड के लिए चुना गया है, तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था. लेकिन वो मेरे अकेले की ही नहीं बल्कि हम सबकी मेहनत का फल है.”

राष्ट्रपति से अवार्ड
राष्ट्रपति से अवार्ड

अड़े रहें और डटे रहें

आज रूमा देवी एक ब्रांड बन चुकी हैं. वे भारत ही नहीं बल्कि दूसरे कई देशों में भारत का परचम लहरा चुकी हैं. अमेरिका, मलेशिया, जर्मनी, सिंगापुर, श्रीलंका सहित दर्जनभर देशों में अपनी प्रदर्शनी लगा चुकी हैं.  आज रूमा के साथ 30 हजार से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं. रूमा ब्रांड के अंदर आज पारंपरिक से लेकर मॉडर्न तक साड़ियां, दुप्पटें, कुर्ता, कर्टेन्स सहित दर्जनों फैशन प्रोडक्ट तैयार किये जा रहे हैं. उनका लक्ष्य अब देशभर की महिलाओं को इससे जोड़ना है. 

वे कहती हैं, “बाड़मेर में अभी हमारे साथ कई महिलाएं जुड़ी हुई हैं. इसी तरीके मैं चाहूंगी कि भविष्य में देश भर की महिलाओं को इससे जोड़ा जाए. इसके साथ मैं राजस्थान की कला को दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास करूंगी. हम चाहेंगे कि जो बच्चे बाहर पढ़ने जाते हैं वो वापिस अपने घरों में लौटें और यहां के लोगों को रोजगार दें ताकि गांव के लोग आगे बढ़ें, क्योंकि जब गांव आगे बढ़ेंगे तो देश आगे बढ़ेगा. आज लड़कियों को छूट मिल रही है. महिलाएं सक्षम होती हैं तो समाज में बदलाव आता है वो आगे बढ़ता है. महिलाओं को महिलाओं का साथ देना चाहिए. अपने हक के लिए खुद लड़ना चाहिए. हम सभी में कुछ न कुछ हुनर होता है इसलिए पीछे नहीं हटें. आगे बढ़ना चाहते हैं तो पीछे नहीं हटें, अड़े रहें और डटे रहें.”