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Rustam Nabiev conquers Mount Everest: रूस के दिव्यांग पूर्व सैनिक ने सिर्फ हाथ के सहारे फतह किया माउंट एवरेस्ट, दोनों पैर के बिना दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई कर बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

किसी ने सच कहा है यदि मन में विश्वास और हौसला बुलंद हो तो कई भी मुश्किल काम किया जा सकता है.  दुर्घटना में अपने दोनों पैर गंवाने वाले रूस के पूर्व सैनिक रुस्तम ने अपने हाथों के सहारे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर पर्वतारोहण के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया है. आइए जानते हैं इस चोटी पर चढ़ाई करने के बाद रुस्तम क्या बोले? 

Rustam Nabiev Rustam Nabiev

साल 2015 में रूस में एक सैन्य बैरक ढहने की दुर्घटना में अपने दोनों पैर गंवाने वाले रूसी पूर्व सैनिक Rustam Nabiev ने केवल अपने हाथों के सहारे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट फतह कर पर्वतारोहण के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित कर दुनिया को चौंका दिया है.

रुस्तम एवरेस्ट इतिहास के पहले ऐसे व्यक्ति बन गए हैं, जिन्होंने दोनों पैर न होने के बावजूद सिर्फ हाथों के बल पर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचने में सफलता हासिल की. उन्होंने अपने 34वें जन्मदिन के अवसर पर इस बार एवरेस्ट अभियान शुरू किया था. कमर के नीचे का हिस्सा न होने के बावजूद उन्होंने एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर इतिहास रच दिया. उनकी इस उपलब्धि को दुनिया भर के मीडिया ने प्रमुखता से स्थान दिया है. 

हर मीटर की दूरी किसी बड़े युद्ध से नहीं थी कम 
इससे पहले, अफगानिस्तान युद्ध में अपने दोनों पैर गंवाने वाले रोल्पा के पूर्व गोरखा सैनिक  हरि बुढ़ा मगर ने ठीक तीन साल पहले यानी 2023 के मई महीने में कृत्रिम पैरों की सहायता से डबल एम्प्युटी श्रेणी में एवरेस्ट चढ़ने का रिकॉर्ड बनाया था. रुस्तम ने अब उस उपलब्धि को भी पीछे छोड़ दिया है. एवरेस्ट आरोहण के बाद काठमांडू लौटे रुस्तम मंगलवार सुबह टर्किश एयरलाइंस की उड़ान से इस्तांबुल होते हुए अपने घर रवाना हुए. इससे पहले उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि सामान्य पर्वतारोहियों के लिए भी एवरेस्ट चढ़ाई शरीर और दिमाग की अंतिम परीक्षा जैसी होती है, लेकिन उनके लिए हर मीटर की दूरी किसी बड़े युद्ध से कम नहीं थी.

असली चुनौती शिखर पर पहुंचना नहीं बल्कि सुरक्षित वापस लौटना था
सबसे कठिन क्षण के बारे में पूछे जाने पर रुस्तम ने कहा, सबसे चुनौतीपूर्ण रास्ता निश्चित रूप से खुम्बु आइसफॉल था, जिसे पार करने में मुझे 15 घंटे लगे. दूसरा सबसे कठिन चरण कैंप 3 से कैंप 4 तक का सफर था, जिसमें 14 घंटे से अधिक समय लगा. रुस्तम नेपाली समय अनुसार 20 मई को सुबह 8:16 बजे एवरेस्ट शिखर पर पहुंचे थे. हालांकि, उनके अनुसार असली चुनौती शिखर पर पहुंचना नहीं बल्कि सुरक्षित वापस लौटना था. उन्होंने कहा कि नीचे उतरना हमेशा सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि अधिकतर पर्वतारोहियों की मौत वापसी के दौरान होती है. मेरे लिए बिना पैरों के उतरना शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से बेहद कठिन था. बर्फीली दीवारों और चट्टानों पर संतुलन बनाए रखने के लिए मुझे लगातार हाथों से खुद को संभालना पड़ता था.

सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने का लक्ष्य
रुस्तम ने बताया कि हाथों के सहारे चलना मानव शरीर के लिए स्वाभाविक नहीं है और इतनी ऊंचाई पर शरीर में कभी भी कोई गंभीर समस्या पैदा हो सकती थी. एवरेस्ट के बाद उनका अगला लक्ष्य सेवन समिट्स यानी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करना है. अब उत्तर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया/ओशिनिया के तीन शिखर उनके लक्ष्य में बाकी हैं. उन्होंने कहा, मैं दुनिया को यह संदेश देना चाहता हूं कि जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न आए, इंसान दोबारा उठ सकता है. हर व्यक्ति अपने जीवन की सबसे ऊंची चोटी छू सकता है, जरूरी नहीं कि वह कोई पहाड़ ही हो.

दिव्यांग लोगों के प्रति समाज का बदलना चाहिए नजरिया 
रुस्तम ने यह भी कहा कि दुनिया भर में दिव्यांग लोगों के प्रति समाज का नजरिया बदलना चाहिए. हम भी इंसान हैं. हमारे शरीर में चाहे कैसी भी चोट हो, हम जीना चाहते हैं, अपनी पहचान बनाना चाहते हैं और कुछ कर दिखाना चाहते हैं. कई बार दिव्यांग लोग स्वस्थ लोगों से भी ज्यादा प्रेरणादायक उपलब्धियां हासिल करते हैं.  उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने सहयोगी शेर्पा दल को भी दिया. उनके साथ पांच अनुभवी शेर्पा लगातार मौजूद थे, जिनमें से दो हमेशा उनके साथ रहते थे जबकि एक सदस्य लगातार उनके ऑक्सीजन स्तर की निगरानी कर रहा था. रुस्तम ने कहा, शेर्पा अद्भुत और बेहद मजबूत लोग हैं. उनके सहयोग के बिना कोई भी पर्वतारोहण संभव नहीं है. नेपाल से जुड़ी एक भावुक याद साझा करते हुए उन्होंने लुक्ला की घटना का जिक्र किया. उन्होंने कहा, मैं सड़क पर चल रहा था, तभी एक छोटी बच्ची मेरे पास आई, उसने मुझे उत्सुकता से देखा और मेरे गाल पर चुम्बन दिया. मेरे लिए वह भगवान के आशीर्वाद जैसा था. रुस्तम ने अपनी असाधारण उपलब्धि से साबित कर दिया कि सच्चे आत्मबल और दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है.