
Muzaffarpur Baglamukhi Temple
Muzaffarpur Baglamukhi Temple
बिहार के मुजफ्फरपुर में एक ऐसा मंदिर है, जहां मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. इस मंदिर की पहचान सिर्फ इसकी प्राचीनता नहीं, बल्कि यहां होने वाली विशेष पूजा-पद्धति और तांत्रिक साधना की परंपरा भी है. हम बात कर रहे हैं मुजफ्फरपुर के कच्ची सराय रोड स्थित मां बगलामुखी पीतांबरी सिद्धपीठ की.
ढाई सौ साल पुराना है मंदिर का इतिहास
मुजफ्फरपुर के इस प्रसिद्ध मंदिर का इतिहास करीब ढाई सौ साल पुराना बताया जाता है. मंदिर से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, मां बगलामुखी की प्रतिमा का निर्माण कोलकाता के कारीगरों ने किया था. मंदिर की स्थापना महंत अजीत कुमार प्रसाद के पूर्वज रूपल प्रसाद ने कराई थी. वर्ष 1993-94 में मंदिर को वर्तमान स्वरूप देने की दिशा में काम शुरू हुआ.
अष्टधातु की प्रतिमा और सहस्त्रदल महायंत्र
मंदिर के गर्भगृह में मां बगलामुखी की दस भुजाओं वाली अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित है. मां पंच प्रेतासन पर विराजमान हैं. मंदिर की एक प्रमुख विशेषता गर्भगृह के नीचे स्थापित सहस्त्रदल महायंत्र है. मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, यहां विशेष साधना और पूजा-अनुष्ठान किए जाते हैं.

मां को प्रिय है पीला रंग
मां बगलामुखी को पीतांबरी भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां की पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व है. श्रद्धालु पूजा के दौरान हल्दी, दही और दूब अर्पित करते हैं. गुरुवार के दिन मंदिर में विशेष रूप से श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है. नवरात्र के दौरान यहां पूजा-अर्चना और अनुष्ठानों का विशेष आयोजन होता है.
देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचते हैं साधक
मां बगलामुखी के इस सिद्धपीठ में बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं. श्रद्धालुओं की आस्था है कि मां की आराधना से उन्हें संकटों से उबरने और मनोकामनाओं की पूर्ति का संबल मिलता है.
कई पीढ़ियों से चली आ रही है पूजा की परंपरा
मंदिर के महंत देव राज ने बताया कि उनके पूर्वज कई पीढ़ियों से मंदिर में पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं. उनकी दादी गुरु अपने समय की प्रसिद्ध तांत्रिक थीं. उनसे तंत्र साधना करने के लिए कोलकाता तक से साधक आते थे.

उन्होंने बताया कि उनके पिता गुरु, महंत अजीत की प्रसिद्धि भी दूर-दूर तक थी. आमतौर पर बिहार के लोग तारापीठ और कामाख्या देवी के दर्शन एवं साधना के लिए जाते हैं, लेकिन मुजफ्फरपुर स्थित मां बगलामुखी शक्तिपीठ में भी दूर-दूर से श्रद्धालु और तंत्र साधक पहुंचते हैं. खासकर नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.
तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र रहा है मंदिर
मंदिर के मुख्य पुजारी बचा बाबा ने बताया कि यह मंदिर करीब ढाई सौ वर्ष पुराना है. उस समय यह तंत्र साधना का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था. मंदिर में तंत्र साधना के साथ-साथ वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग, दोनों पद्धतियों से पूजा-अर्चना की जाती है. उन्होंने बताया कि मंदिर में स्थापित सहस्त्रदल महायंत्र और दस भुजाओं वाली मां बगलामुखी की प्रतिमा की पूजा का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यता है कि मां की आराधना से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मुजफ्फरपुर का मां बगलामुखी मंदिर धार्मिक आस्था, प्राचीन परंपरा और विशिष्ट पूजा-पद्धति का एक प्रमुख केंद्र है.
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