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Adra Nakshatra 2026: सूर्य का आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश, बिहार-यूपी में क्यों है इन दिनों में आम, खीर और दाल पूरी खाने की परंपरा? जानें वैज्ञानिक कारण

आर्द्रा नक्षत्र सिर्फ एक ज्योतिषीय घटना नहीं है. यह भारतीय कृषि संस्कृति, मानसून और खान-पान की परंपराओं से जुड़ा हुआ समय है. इसमें आम, खीर और दाल वाली पूरी खाने की परंपरा है. यही वजह है कि सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी बिहार, मिथिलांचल और पूर्वांचल के घरों में पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है.

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22 जून 2026 को सूर्य देव मृगशिरा नक्षत्र से निकलकर आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश कर चुके हैं, जो 6 जुलाई तक रहेगा. बिहार के पूर्वांचल, मिथिलांचल और झारखंड में इसे आदरा या अरदरा भी कहा जाता है. ज्योतिष शास्त्र में आर्द्रा नक्षत्र के देवता भगवान रुद्र (शिव) माने गए हैं, जबकि इसका स्वामी राहु है. ग्रामीण भारत में इस नक्षत्र का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि कृषि और मौसम से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि आर्द्रा नक्षत्र के साथ ही मानसून का प्रभाव बढ़ने लगता है और धरती नई फसल के लिए तैयार होती है.

क्या है आर्द्रा नक्षत्र?
आर्द्रा आकाश मंडल का छठा नक्षत्र माना जाता है. संस्कृत में "आर्द्रा" का अर्थ होता है 'नमी युक्त' या 'भीगा हुआ'. यही वजह है कि इस नक्षत्र को वर्षा ऋतु की शुरुआत का संकेत माना जाता है. किसानों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि धान की रोपाई और खेती-किसानी के प्रमुख कार्य इसी अवधि में शुरू होते हैं.

आम खाने की परंपरा क्यों है?
मिथिलांचल और बिहार के कई इलाकों में आर्द्रा नक्षत्र के दिन आम खाने की परंपरा है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जून के अंतिम सप्ताह तक आम पूरी तरह प्राकृतिक रूप से पक चुका होता है. इसमें विटामिन A, विटामिन C, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं. गर्मी के लंबे मौसम के बाद शरीर में ऊर्जा की कमी होने लगती है. आम शरीर को तुरंत ऊर्जा देने के साथ इम्यूनिटी मजबूत करने में भी मदद करता है. इसलिए इस समय आम खाना सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि मौसम के अनुसार शरीर को तैयार करने का एक प्राकृतिक तरीका भी माना जा सकता है.

खीर बनाने और खाने का क्या कारण है?
आर्द्रा नक्षत्र के अवसर पर कई घरों में खीर बनाई जाती है. दूध और चावल से बनने वाली खीर शरीर को ठंडक पहुंचाती है. मानसून की शुरुआत में पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. ऐसे समय में दूध और चावल का संयोजन शरीर को संतुलित पोषण देता है. खीर को शुभता, समृद्धि और नए कृषि चक्र की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है.

दाल वाली पूरी का महत्व क्या है?
आर्द्रा नक्षत्र के दिन कई जगहों पर दाल भरी पूरी बनाने की परंपरा भी है. इसका एक व्यावहारिक कारण भी है. मानसून शुरू होने के साथ खेतों में काम बढ़ जाता है. ऐसे समय शरीर को अधिक ऊर्जा और प्रोटीन की जरूरत होती है. दाल और गेहूं का यह संयोजन भरपूर पोषण देता है और लंबे समय तक पेट भरा रखता है. इसी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में इसे श्रम करने वाले लोगों के लिए आदर्श भोजन माना जाता है.

दाल वाली पूरी की आसान रेसिपी-
2 कप गेहूं का आटा
1 कप चना दाल
1 चम्मच जीरा
अदरक- 1 इंच
लाल मिर्च खड़ा- 1
1 चम्मच सौंफ
1/2 चम्मच हल्दी
1/2 चम्मच लाल मिर्च पाउडर
स्वादानुसार नमक
तलने के लिए सरसों का तेल या फिर घी

बनाने की तरीक-
चना दाल को 3-4 घंटे भिगोकर 2 सीटी आने तक उबाल लें.
उबली हुई दाल का पानी निकालकर उसे दरदरा पीस लें.
एक कड़ाई में थोड़ा तेल डालकर जीरा, सौंफ और अदरक के साथ लाल मिर्च डाल कर सुनहरा होने तक भूनें.
इसमें पिसी हुई दाल डालकर 5-7 मिनट तक पकाएं.
अब गेहूं के आटे का नरम आटा गूंथ लें.
छोटी लोई बनाकर उसमें दाल का मिश्रण भरें.
पूरी की तरह बेलकर गर्म तेल में सुनहरा होने तक तल लें.
गरमा-गरम दाल वाली पूरी को खीर, आम और चाहें तो आलू की सब्जी के साथ परोसा सकते हैं.
 

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