scorecardresearch

Haridwar Kanwar Yatra: बहु बनी श्रवण कुमार! सास को कांवड़ में बैठाकर कर रही हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा

हर साल कांवड़ यात्रा में ऐसे कवड़ियां भी दिखाई देते हैं, जो अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराते हैं. हम आज आपको एक ऐसी बहु के बारे में बता रहे हैं, जो अपनी वृद्ध सास को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ की यात्रा करा रही हैं. बहु पिंकी अपनी सास को कावड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल लेकर जा रहीं हैं.  

Daughter-in-law becomes Shravan Kumar Daughter-in-law becomes Shravan Kumar

आपने कांवड़ यात्रा के दौरान अक्सर ऐसे कवड़ियों को भी देखा होगा जो अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर यात्रा कराते हैं और लोग उन्हें आधुनिक श्रवण कुमार कहते हैं. इस बार हरिद्वार की सड़कों पर एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने लोगों को ठहरकर देखने के लिए विवश कर दिया. जी हां, एक बहू अपनी वृद्ध सास को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ की यात्रा करवाते हुए दिखाई दीं. बहु पिंकी अपनी सास ऊषा को कावड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल ले कर जा रही हैं. इस अनोखी यात्रा में एक छोटी पोती भी अपनी दादी की सेवा में कदम से कदम मिलाकर चल रही है.

सास ने जताई थी यह इच्छा 
उत्तर प्रदेश के हापुड़ निवासी ऊषा देवी की लंबे समय से कांवड़ यात्रा और गंगा स्नान की इच्छा थी लेकिन उम्र बढ़ने के कारण उनके लिए पैदल यात्रा करना संभव नहीं था. हालांकि परिवार में चार पुत्र हैं लेकिन उनकी इच्छा को उनकी बहू पिंकी ने पूरा करने का संकल्प लिया. पिंकी अपनी सास ऊषा देवी को हरिद्वार लेकर पहुंचीं और सबसे पहले हर की पैड़ी पर गंगा स्नान कराया. फिर विशेष रूप से तैयार की गई कांवड़ में बैठाकर हापुड़ की पैदल यात्रा शुरू कीं. अब वह हरिद्वार से हापुड़ तक का सफर अपनी सास को कंधों का सहारा देकर तय कर रही हैं. बहू के इस समर्पण को देखकर लोग उसे आधुनिक श्रवण कुमार की संज्ञा दे रहे हैं.

सास की सेवा करना है सौभाग्य 
पिंकी का कहना है कि सास की सेवा करना उनका कर्तव्य ही नहीं बल्कि सौभाग्य भी है, उन्होंने कहा कि जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों के लिए जीवनभर त्याग करते हैं, उसी तरह बुढ़ापे में उनकी सेवा करना परिवार की जिम्मेदारी है. उधर, पोती राधा यात्रा के दौरान कभी कांवड़ को संभालने में मदद करती है तो कभी अपनी दादी का हालचाल पूछती रहती है. राधा अपनी मां के पुनीत कार्य मे पूरा सहयोग कर रही है. बहु के कार्य से ऊषा देवी भावुक होकर कहती हैं कि बस यही है जो उनकी इच्छा को पूरा करने का कार्य कर रही है. उनके बेटे तो कई हैं पर यही उनको यात्रा करवा रही है.