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Dussehra: इस गांव में होती है रावण की पूजा, 350 साल पुरानी है परंपरा

रावण को लेकर देश में अलग-अलग मान्यताएं हैं. महाराष्ट्र के सांगोला में रावण की पूजा की यह परंपरा ग्रामीणों की सदियों पुरानी आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है. दशहरे पर यहां रावण का दहन नहीं, बल्कि दशानन की आराधना होती है.

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Dussehra Dussehra

आज यानी दशहरा के दिन देशभर में रावण के पुतले जलाए जाएंगे. बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाएगा. लेकिन महाराष्ट्र के अकोला में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि सिर झुकाकर उसकी पूजा की जाती है. यहां रावण कोई खलनायक नहीं, बल्कि ग्रामदेवता है. गांववालों का विश्वास है कि सोने की लंका के राजा रावण की आराधना से उनका गांव भी सोने जैसा समृद्ध हुआ है. करीब साढ़े तीन सौ साल से चली आ रही इस परंपरा में आज भी पूरा गांव शामिल होता है. 

देश में रावण दहन, सांगोला में रावण पूजन-
दशहरा यानी विजयादशमी पर पूरे देश में रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है. लेकिन अकोला जिले की पातुर तहसील के सांगोला गांव में तस्वीर बिल्कुल अलग है. यहां रावण का पुतला नहीं जलता, बल्कि दस सिरों वाले दशानन की पूजा होती है. गांव के लोग रावण को अपना ग्रामदेवता और रक्षक मानते हैं. दशहरे के दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें पूरे गांव के लोग शामिल होते हैं. इतना ही नहीं, सालभर भी इस प्रतिमा की नियमित पूजा होती है और महिलाएं भी श्रद्धापूर्वक आराधना में हिस्सा लेती हैं.

350 साल पुरानी परंपरा-
सांगोला में रावण की पूजा की परंपरा करीब 350 साल पुरानी बताई जाती है. स्थानीय मान्यता के मुताबिक, गांव में एक ऋषि महाराज रहा करते थे, जिन्हें ग्रामीण अपना श्रद्धास्थान मानते थे. कहा जाता है कि ऋषि महाराज ने अपने अंतिम समय में ऐसी प्रतिमा स्थापित करने की बात कही, जिसमें दस बिंदु या चिह्न हों. लेकिन मूर्तिकार ने दस मुखों वाली प्रतिमा बना दी, जो रावण जैसी दिखाई देती थी.

जब इस प्रतिमा को बैलगाड़ी से गांव लाया जा रहा था, तो मान्यता के अनुसार बैलगाड़ी गांव की सीमा पार नहीं कर सकी. ग्रामीणों ने इसे दैवीय संकेत माना और उसी स्थान पर प्रतिमा स्थापित कर दी. तभी से दशमुखी रावण को ग्रामदेवता मानकर पूजने की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है. यह गांव की लोकमान्यता है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी ग्रामीण आगे बढ़ाते आ रहे हैं.

‘सोने की लंका का राजा, हमारा गांव भी सोने जैसा समृद्ध’
रावण के परम भक्त ज्ञानेश्वर महाराज धाकरे का कहना है कि गांव में रावण की पूजा उसके चरित्र के हर पहलू का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति उसकी भक्ति, आराधना और साधना के सम्मान में की जाती है. उनका कहना है कि रावण सोने की लंका का राजा था. गांववाले उसकी पूजा करते हैं और उनका विश्वास है कि उनका गांव भी सोने जैसा सुखी और समृद्ध हुआ है. ग्रामीण इस समृद्धि को रावण महाराज की कृपा से जोड़कर देखते हैं.

जहां देश के कई हिस्सों में रावण को बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, वहीं सांगोला में उसकी शिवभक्ति और ग्रामदेवता के रूप में मान्यता इस परंपरा को एक अलग पहचान देती है.

आस्था, परंपरा और ग्रामीणों का विश्वास-
ग्रामीणों का मानना है कि जबसे रावण महाराज की पूजा की परंपरा शुरू हुई, गांव सुख-समृद्धि से जुड़ा रहा है. वे रावण को अपना रक्षक मानते हैं और मानते हैं कि उसकी आराधना से गांव पर संकट नहीं आता. दशहरे के दिन विशेष पूजा के दौरान ग्रामीण एकजुट होकर अपनी परंपरा निभाते हैं. महिलाओं की भागीदारी भी इस धार्मिक परंपरा का अहम हिस्सा है. सांगोला की यह मान्यता बताती है कि भारत में धार्मिक आस्थाएं और लोकपरंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूप लेती हैं. यहां दशहरा रावण दहन के बजाय ग्रामदेवता की पूजा और सामूहिक श्रद्धा का अवसर बन जाता है.

देशभर में जहां दशहरे पर रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं अकोला के सांगोला गांव में रावण को ग्रामदेवता मानकर उसकी पूजा की जाती है. करीब 350 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में ग्रामीण सोने की लंका के राजा रावण की शिवभक्ति को याद करते हैं और विश्वास करते हैं कि उनकी आराधना से उनका गांव भी सोने जैसा सुखी और समृद्ध बना है.

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