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सदियों से निभाई जा रही अनोखी रस्म! धधकते अंगारों पर नंगे पैर चलते हैं आगिया गांव के श्रद्धालु, क्या है आस्था की ताकत

फाल्गुन पूर्णिमा की रात जब गांव के चौराहों पर होली जलाई जाती है, तो उसे देखने के लिए राज्यभर से हजारों की भीड़ उमड़ती है. लेकिन असली चमत्कार तब होता है जब होली की लपटें शांत होती हैं और पीछे रह जाते हैं लाल सुर्ख अंगारे.

Holi in Agiya village Holi in Agiya village
हाइलाइट्स
  • होलिका के बाद अंगारों पर चलता है पूरा गांव

  • क्या है इस परंपरा के पीछे की मान्यता?

भारत के कोने-कोने में होली का त्योहार अलग-अलग रंगों और ढंग से मनाया जाता है लेकिन गुजरात के साबरकांठा जिले के खेड़ब्रह्मा तालुका में एक ऐसा गांव है, जहां होली की आग शांत होने के बाद भक्ति का असली इम्तिहान शुरू होता है. यहां 'आगिया' गांव में श्रद्धालु धधकते हुए अंगारों पर नंगे पैर चलते हैं. क्या है इसके पीछे की मान्यता और क्यों भक्त नहीं डरते इस दहकती आग से? चलिए जानते हैं.

आगिया गांव में सदियों से चली आ रही परंपरा
साबरकांठा जिले के खेड़ब्रह्मा से 10 किलोमीटर दूर अंबाजी रोड पर स्थित एक आगिया गांव है. यहां सदियों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही है जो विज्ञान को चुनौती देती है और आस्था को अटूट बनाती है. कहा जाता है कि यहां होली की परंपरा पांडव काल से चली आ रही है.

holika Dahan

धधकते अंगारों पर चलते हैं भक्त
फाल्गुन पूर्णिमा की रात जब गांव के चौराहों पर होली जलाई जाती है, तो उसे देखने के लिए राज्यभर से हजारों की भीड़ उमड़ती है. लेकिन असली चमत्कार तब होता है जब होली की लपटें शांत होती हैं और पीछे रह जाते हैं लाल सुर्ख अंगारे. धधकते अंगारों पर जब भक्त चलते हैं, तो उनके चेहरों पर खौफ नहीं बल्कि मुस्कान होती है. 

जहां जलती ध्वजा का अंश गिरे वहां होती है संतान
यहां की एक और रोचक मान्यता है. होली की जलती हुई धजा जिस दिशा में गिरती है, उससे आने वाले साल के शगुन और पैदावार का अनुमान लगाया जाता है. साथ ही, ऐसी भी मान्यता है कि जिसकी गोद में जलती ध्वजा का अंश गिरता है, उसके घर में संतान का आगमन होता है.

-हसमुखभाई तलशीभाई पटेल