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Indore News: 200 साल पुरानी विरासत में सजे बप्पा... होलकर अंदाज की पगड़ी बनी पहचान

200 साल पहले जिस कला ने होलकर दरबार में अपनी पहचान बनाई, आज वही कला परिवार के हाथों से फिर जीवंत हो रही है. इंदौर के जूनी इंदौर इलाके में रहने वाले खरगोंकर परिवार के लिए गणेश प्रतिमा बनाना सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है.

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Idol of Lord Ganesha Idol of Lord Ganesha

गणेश प्रतिमा तो आपने कई देखी होंगी, लेकिन बप्पा के सिर पर सजी पगड़ी आपको कुछ पल के लिए रोक दे, तो समझिए आप इंदौर की उस विरासत के सामने खड़े हैं, जिसकी कहानी करीब दो सदियों पुरानी है. खरगोंकर परिवार आज भी मिट्टी में वही शाही अंदाज गढ़ रहा है, जो कभी होलकर राजघराने की पहचान हुआ करता था. खास बात ये है कि इस परंपरा को निभाने के लिए परिवार की छठी पीढ़ी के साथ सातवीं पीढ़ी भी आगे आ रही है. 

आज भी जीवंत है यह कला
विदेशों में रहने वाले परिवार के सदस्य भी गणेश उत्सव से पहले इंदौर लौटकर इस विरासत में अपना योगदान देते हैं. दरअसल इंदौर के जूनी इंदौर इलाके में रहने वाले खरगोंकर परिवार के लिए गणेश प्रतिमा बनाना सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है. करीब 200 साल पहले जिस कला ने होलकर दरबार में अपनी पहचान बनाई, आज वही कला परिवार के हाथों से फिर जीवंत हो रही है. 

इन प्रतिमाओं को देखते ही सबसे पहले नजर पड़ती है गणेश जी के सिर पर सजी खास पगड़ी पर. यही होलकर शैली इन प्रतिमाओं को दूसरी गणेश प्रतिमाओं से अलग पहचान देती है. छोटी हो या बड़ी, बप्पा का स्वरूप इसी पारंपरिक अंदाज में तैयार किया जाता है. मिट्टी, प्राकृतिक रंग, हाथों का हुनर और होलकर काल की वही शाही पगड़ी. इन सबको मिलाकर खरगोंकर परिवार बप्पा को सिर्फ आकार नहीं देता, बल्कि इंदौर के इतिहास का एक हिस्सा भी हर साल फिर से गढ़ता है. करीब दो सौ साल बाद भी ये परंपरा उसी श्रद्धा और शाही अंदाज के साथ आगे बढ़ रही है.

प्राकृतिक रंगों का किया जाता है इस्तेमाल
मूर्ति का निर्माण करने वाले कलाकार श्याम खरगोंकर ने बताया कि मूर्ति निर्माण की शुरुआत से लेकर अंतिम रूप देने तक परिवार के कई सदस्य एक साथ जुटते हैं. प्राकृतिक पीली मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल कर प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं. एक प्रतिमा को आकार देने में करीब 15 दिन लगते हैं, जबकि पूरे सीजन का काम लगभग चार महीने तक चलता है. 

खास बात ये भी है कि इस विरासत से परिवार के सदस्य दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहकर भी जुड़े हैं. उनके परिवार की बेटी कनाडा और बेटा अमेरिका से इंदौर पहुंचते हैं और कुछ दिनों के लिए ही सही, लेकिन बप्पा को आकार देने में अपने हाथ जरूर लगाते हैं. श्याम खरगोंकर ने बताया कि कभी इन प्रतिमाओं का निर्माण सिर्फ होलकर स्टेट के लिए किया जाता था, लेकिन समय के साथ खरगोंकर परिवार की कला आम लोगों तक भी पहुंची. अब गणेश उत्सव से करीब दो से तीन महीने पहले ही प्रतिमाओं के ऑर्डर मिलने लगते हैं.