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1965 की जंग से जुड़ी है चमत्कार की कहानी, नवरात्र में तनोट माता के दर्शन को उमड़े हजारों श्रद्धालु

नवरात्र के अवसर पर चमत्कारी मंदिर के नाम से विख्यात तनोट माता मंदिर में पहले दिन घट कलश की स्थापना ढोल धमाके से के साथ कि गयी. इस दौरान बाकयदा एक भव्य शोभायात्रा का आयोजन माता मंदिर तक किया गया, इसके बाद में मंदिर प्रांगण में हवन-यज्ञ का आयोजन किया गया.

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1200 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध तनोट राय मंदिर 1200 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध तनोट राय मंदिर

राजस्थान के जैसलमेर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास स्थित करीब 1200 साल पुराने तनोट माता मंदिर में नवरात्र मेले की शुरुआत हो गई है. पहले दिन हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचे. मंदिर में घट स्थापना, हवन-यज्ञ और आरती के साथ मेले का शुभारंभ हुआ. श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बीएसएफ ने भोजन, चिकित्सा और सुरक्षा के खास इंतजाम किए हैं.

तनोट माता मंदिर में रविवार को घट स्थापना के साथ 10 दिवसीय नवरात्र मेले की शुरुआत हुई. इस मौके पर ढोल-नगाड़ों के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गई. इसके बाद मंदिर परिसर में हवन-यज्ञ का आयोजन हुआ, जिसमें बीएसएफ की 26 वीं बटालियन के कमांडेंट लिन्जकाई सितलऊ सहित कई अधिकारियों और जवानों ने हिस्सा लिया और आहुतियां दीं. हवन के बाद श्रद्धालुओं ने माता की आरती की और प्रसाद ग्रहण किया. नवरात्र के पहले दिन करीब 20 हजार से ज्यादा श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचे. मंदिर को आकर्षक रोशनी और सजावट से सजाया गया है. भीड़ को देखते हुए मंदिर के बाहर बड़ी एलसीडी स्क्रीन भी लगाई गई है, ताकि श्रद्धालु आसानी से माता के दर्शन और आरती देख सकें.

श्रद्धालुओं के लिए बीएसएफ ने किए खास इंतजाम
नवरात्र मेले में आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए बीएसएफ की ओर से विशेष व्यवस्था की गई हैं. मंदिर में सुबह से शाम तक भंडारे का आयोजन किया जा रहा है. इसके अलावा श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सा शिविर लगाया गया है. सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बीएसएफ के जवानों के साथ पुलिसकर्मियों को भी तैनात किया गया है. नवरात्र के दौरान हर दिन तीन आरतियां होंगी. मंदिर में बीएसएफ के जवान ही पुजारी की भूमिका निभाते हैं. जवान मंदिर की देखरेख के साथ श्रद्धालुओं के भोजन और दूसरी सुविधाओं का भी ध्यान रखते हैं.

क्यों खास है तनोट माता मंदिर?
जैसलमेर से करीब 120 किलोमीटर दूर स्थित तनोट माता मंदिर करीब 1200 साल पुराना है. इसे बमों वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना की ओर से मंदिर के आसपास कई बम गिराए गए थे, लेकिन वे नहीं फटे. इस घटना से जुड़ी मान्यताओं के कारण जवानों और स्थानीय लोगों की माता के प्रति आस्था और मजबूत हुई. मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए मन्नत का धागा बांधने की विशेष व्यवस्था भी है. देश के अलग-अलग हिस्सों से भक्त यहां सुख-शांति और खुशहाली की कामना लेकर पहुंचते हैं. नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है.

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