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Jitiya Vrat 2026 Nahay Khay Rules: जितिया नहाय-खाय पर क्या खाएं? जानिए तिथियां, पारण समय और पौराणिक महत्व

जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत संतान की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला अत्यंत कठिन और पावन निर्जला व्रत है. वर्ष 2026 में नहाय-खाय 2 अक्टूबर, मुख्य व्रत 3 अक्टूबर और पारण 4 अक्टूबर को होगा.

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जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला बेहद कठिन व्रत है. यह व्रत भगवान जीमूतवाहन को समर्पित माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीमूतवाहन बेहद दयालु, धर्मात्मा और परोपकारी गंधर्व या विद्याधर राजकुमार थे. माताएं इस व्रत को 24 से 36 घंटे के लिए पूरी श्रद्धा और कठिन नियमों के साथ करती हैं. यहां तक की इस व्रत के दौरान पानी तक भी नहीं पिया जाता.

व्रत का मुहूर्त
संतान समृद्धि का ये जितिया व्रत तीन दिनों तक चलता है. पहले दिन नहाय-खाय से शुरू होता है, दूसरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है और तीसरे दिन पारण के साथ व्रत पूरा होता है. साल 2026 में नहाय-खाय 2 अक्टूबर, शुक्रवार को, जितिया का मुख्य व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को और पारण 4 अक्टूबर, रविवार को होगा. पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर सुबह 7:59 बजे से शुरू होकर 4 अक्टूबर सुबह 5:51 बजे तक रहेगी. माताएं विधि विधान के साथ पारण 4 अक्टूबर को सुबह 7:28 बजे के बाद कभी भी कर सकती हैं. 

नहाय-खाय में क्या खाया जाता है?
नहाय-खाय के दिन क्या खाना है, इसे लेकर भी अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. मान्यता और परंपरा के अनुसार इस दिन कुछ ऐसे भोजन किए जाते हैं, जिन्हें अन्य पूजा में अशुद्ध माना जाता है. इसमें पोई का साग, नोनी का साग, सतपुतिया और पोठिया मछली शामिल है. इन सभी चीजों को मड़वा यानी रागी की रोटी के साथ खाने की परंपरा है. 

उसके बाद व्रत से पहले माताएं दही चूड़ा खाती हैं. उसके बाद पान खाकर व्रत शुरूआत करने की परंपरा है. हालांकि इसके अलावा नहाय-खाय के भोजन में क्षेत्र और परिवार की परंपरा के हिसाब से बदलाव भी देखने को मिलता है. कई परंपराओं में भोजन को सात्विक रखा जाता है और लहसुन-प्याज का इस्तेमाल नहीं किया जाता.

क्यों रखा जाता है इतना कठिन व्रत?
जितिया व्रत को कठिन इसलिए माना जाता है क्योंकि मुख्य व्रत के दिन माताएं निर्जला उपवास करती हैं. यानी पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता. इसी वजह से नहाय-खाय के दिन भोजन को व्रत की शुरुआत से पहले का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. कई बार यह व्रत 24 घंटे की जगह 36 घंटे का भी हो जाता है. 

कौन थे भगवान जीमूतवाहन?
पौराणिक कथा में जीमूतवाहन को एक दयालु और परोपकारी राजकुमार बताया गया है. उनके पिता वृद्धावस्था में वानप्रस्थ चले गए और राजपाट की जिम्मेदारी जीमूतवाहन को सौंप दी. हालांकि उनका मन राजकाज में नहीं लगा. उन्होंने राज्य का भार अपने भाइयों को सौंप दिया और पिता की सेवा के लिए वन चले गए. बाद में उनका विवाह मलयवती नाम की राजकन्या से हुआ.

नाग माता की परेशानी सुनकर खुद बलिदान देने पहुंच गए
कथा के अनुसार एक दिन वन में जीमूतवाहन की मुलाकात एक वृद्ध नाग माता से हुई. वह अपने बेटे शंखचूड़ को लेकर रो रही थीं. उन्होंने बताया कि नागों ने गरुड़ के सामने रोज एक नाग को भोजन के रूप में देने की प्रतिज्ञा की है और अब उनके बेटे की बारी है. जीमूतवाहन ने माता को भरोसा दिलाया कि वह उनके बेटे की जान बचाएंगे. इसके बाद उन्होंने खुद को लाल कपड़े में ढका और उस जगह जाकर लेट गए, जहां गरुड़ नाग को लेने आने वाले थे. उन्होंने शंखचूड़ की जगह अपना जीवन बलिदान करने का फैसला किया. यही त्याग और परोपकार जितिया व्रत की कथा में जीमूतवाहन के महत्व को खास बनाता है.
 

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