Mansapurna Mahadev Temple and the Pathan Sahab Majar
Mansapurna Mahadev Temple and the Pathan Sahab Majar
एक ऐसे दौर में, जब छोटी-छोटी बातों पर धार्मिक तनाव और विवाद की खबरें अक्सर सुर्खियां बनती हैं, वहीं राजस्थान के कोटा शहर से सांप्रदायिक सौहार्द, आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो पूरे देश के लिए मिसाल बन सकती है. शहर के तुल्लापुरा स्थित रेलवे परिसर में एक ही दीवार, एक ही रास्ते और एक ही प्रवेश द्वार के भीतर 'मनसापूर्ण महादेव' का मंदिर और 'पठान साहब' की मजार एक-दूसरे के बिल्कुल पास स्थित हैं. सबसे खास बात यह है कि पिछले करीब 40 वर्षों में यहां कभी किसी तरह का विवाद, मनमुटाव या हस्तक्षेप देखने को नहीं मिला. दोनों धर्मों के लोग पूरी श्रद्धा, अकीदत और सम्मान के साथ यहां अपनी-अपनी पूजा और इबादत करते हैं.
1985 से शुरू हुआ आस्था और भाईचारे का यह साझा सफर
स्थानीय निवासी 68 वर्षीय रमेश चंद्र बताते हैं कि उनका बचपन इसी इलाके में बीता है और वे वर्ष 1989 से लगातार इस परिसर में आ रहे हैं. उनके अनुसार, वर्ष 1985 के आसपास यहां एक छोटे से मनसापूर्ण महादेव मंदिर का निर्माण हुआ था. इसके कुछ समय बाद, जब इलाके के सम्मानित बुजुर्ग नन्नू चाचा जीवित थे, तब उन्होंने आपसी प्रेम, सद्भाव और धार्मिक एकता का संदेश देने के उद्देश्य से मंदिर के ठीक पीछे 'पठान साहब' की मजार का निर्माण करवाया.
तब से लेकर आज तक यह स्थान दोनों समुदायों की साझा आस्था का केंद्र बना हुआ है. रोजाना 200 से 300 श्रद्धालु यहां अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं. कई लोग मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने के बाद मजार पर चादर चढ़ाकर सिर झुकाते हैं, तो कई पहले मजार पर अकीदत पेश कर मंदिर में दर्शन करते हैं.
न पंडित... न मौलवी, यहां सबसे बड़ा धर्म है इंसानियत
इस परिसर की सबसे अनूठी पहचान यही है कि यहां कोई स्थायी पंडित नहीं है और न ही कोई मौलवी. यहां किसी भी व्यक्ति को पूजा या इबादत करने के लिए किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं पड़ती. हर व्यक्ति पूरी स्वतंत्रता के साथ अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना या इबादत करता है. रमेश चंद्र बताते हैं कि यहां कभी छुआछूत, भेदभाव, ऊंच-नीच या धर्म के आधार पर कोई दूरी नहीं रही. यहां आने वाला हर व्यक्ति समान अधिकार के साथ अपनी आस्था व्यक्त करता है. यही वजह है कि यह परिसर इंसानियत, समानता और भाईचारे की जीवंत मिसाल बन गया है.
व्यवस्था भी देती है एकता का संदेश
इस साझा आस्था स्थल की व्यवस्था भी सामाजिक समरसता का प्रतीक है. पठान साहब की मजार की साफ-सफाई और देखरेख की जिम्मेदारी आज भी नन्नू चाचा के पोते-पोतियां (बच्चों के बच्चे) पूरी निष्ठा और शिद्दत से निभा रहे हैं. वहीं मनसापूर्ण महादेव मंदिर के रखरखाव, विकास और व्यवस्थाओं के लिए स्थानीय लोगों की एक कार्यकारिणी बनाई गई है, जो आपसी सहयोग से सभी व्यवस्थाएं संभालती है.
त्योहारों पर दिखती है आस्था की अनूठी त्रिवेणी
इस परिसर में सालभर धार्मिक आयोजनों की रौनक बनी रहती है. हर मंगलवार और शनिवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं. सावन के महीने में मनसापूर्ण महादेव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं कि कई बार लोगों को अपनी बारी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, लेकिन पूरा आयोजन बेहद शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न होता है.
दूसरी ओर, जब भी उर्स या मुस्लिम समुदाय का कोई धार्मिक पर्व आता है, तब मजार पर बड़ी संख्या में जायरीन पहुंचते हैं. वे पूरी अकीदत के साथ लोबान और धुनी जलाकर इबादत करते हैं. इस दौरान भी दोनों समुदायों के बीच कभी किसी प्रकार का टकराव या हस्तक्षेप देखने को नहीं मिला.
कोटा का इकलौता साझा आस्था स्थल
स्थानीय लोगों का दावा है कि पूरे कोटा शहर में यह संभवतः इकलौता ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां मंदिर और मजार न केवल एक ही परिसर में स्थित हैं, बल्कि दोनों का रास्ता और प्रवेश द्वार भी एक ही है. दशकों बीत जाने के बावजूद यहां कभी किसी तरह का धार्मिक विवाद नहीं हुआ. यही वजह है कि यह स्थान आज भी गंगा-जमुनी तहज़ीब, अनेकता में एकता, सांप्रदायिक सौहार्द और इंसानियत की ऐसी मिसाल बना हुआ है, जिसकी आज पूरे देश को सबसे ज्यादा जरूरत है. यह परिसर केवल पूजा और इबादत का स्थान नहीं, बल्कि यह संदेश भी देता है कि जब दिलों में सम्मान, भरोसा और भाईचारा हो, तब धर्म नहीं, बल्कि इंसानियत सबसे बड़ी पहचान बन जाती है.