गणेश पंडाल में दिखी 80 के दशक की अनोखी झांकी
गणेश पंडाल में दिखी 80 के दशक की अनोखी झांकी
आज सोशल मीडिया पर 1980 के दशक की तस्वीरों को AI के जरिए दोबारा बनाने का ट्रेंड चल रहा है, लेकिन महाराष्ट्र के अकोला में एक गणेश पंडाल ने इस दौर को तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा. सिंधी कैंप के रोज परिवर्तन गणेश पंडाल में 1980 के दशक के गांव और देहात की जिंदगी को पूरी झांकी के रूप में सजाया गया है. यहां पहुंचते ही मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया से अलग उस समय का माहौल देखने को मिलता है. इस झांकी में उस दौर की कई ऐसी चीजें दिखाई गई हैं, जिन्हें आज की पीढ़ी शायद ही इस्तेमाल करती हो. दो माचिस की डिब्बियों और धागे से बनाया गया खिलौना फोन भी यहां रखा गया है. बच्चों के लिए यह उस समय का एक मजेदार खेल हुआ करता था. झांकी में कुएं से पानी भरना, बैलगाड़ी और खेती, मिट्टी के चूल्हे पर खाना, सिलबट्टे पर मसाला पीसना और गोबर से लिपे घर भी दिखाए गए हैं. कवेलू की छत, ग्राम पंचायत और खेतों में बैल-हल के जरिए खेती का दृश्य भी उस समय के गांव की तस्वीर सामने रखता है.
साइकिल के टायर से लेकर जमीन पर पढ़ाई तक
उस समय बच्चों के मनोरंजन के साधन भी आज से बिल्कुल अलग थे. पंडाल में साइकिल के पुराने टायर को लकड़ी से धकेलकर खेलने का दृश्य दिखाया गया है. वहीं, स्कूल में बच्चों के जमीन पर बैठकर पढ़ने, पुरानी स्कूल ड्रेस, किताबों और स्लेट से पढ़ाई करने की झलक भी दिखाई गई है. यह झांकी सिर्फ पुरानी चीजें दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को यह समझाने की कोशिश करती है कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का बचपन किस तरह बीता था.
मिट्टी का चूल्हा और सिलबट्टा बना आकर्षण
1980 के दशक की रसोई को भी पंडाल में खास जगह दी गई है. उस समय गैस स्टोव और आधुनिक किचन की जगह मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाने का चलन था. मसाले पीसने के लिए सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता था. इन चीजों को देखकर पुरानी पीढ़ी के लोग अपने घर और बचपन की यादों से जुड़ रहे हैं.
टीवी आया तो पूरे घर में जुटता था परिवार
झांकी में उस दौर का बॉक्स टीवी और उसकी छत पर लगी एंटीना भी दिखाई गई है. गांव में जब नया-नया टेलीविजन आया था, तब वह अपने आप में बड़ा आकर्षण हुआ करता था. पूरा परिवार स्क्रीन के सामने बैठकर कार्यक्रम देखता था और पसंदीदा कार्यक्रम का इंतजार करता था.
बायोस्कोप और चिट्ठी का इंतजार
उस समय गांवों में टॉकीज आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, ऐसे में बायोस्कोप मनोरंजन का एक खास साधन था. पंडाल में बायोस्कोप के जरिए फिल्म देखने का दृश्य भी बनाया गया है. इसके साथ साइकिल पर चिट्ठी लेकर आता पोस्टमैन भी झांकी का हिस्सा है. उस दौर में किसी अपने की चिट्ठी का इंतजार कई दिनों तक रहता था.
दो पीढ़ियों को जोड़ रही है झांकी
रोज परिवर्तन गणेश पंडाल के अध्यक्ष राजकुमार गिर के मुताबिक, हर साल गणेश उत्सव के जरिए कोई न कोई संदेश देने की कोशिश की जाती है. इस बार 1980 के दशक के गांव और उस समय की जीवनशैली को दिखाने का प्रयास किया गया है. उनका कहना है कि आज की पीढ़ी मोबाइल और डिजिटल दुनिया में बड़ी हो रही है, इसलिए उसे यह भी पता होना चाहिए कि उनके माता-पिता और बुजुर्ग किस तरह की जिंदगी जीते थे. इस झांकी में एक तरफ स्मार्टफोन और इंटरनेट की आज की दुनिया है तो दूसरी ओर कुआं, मिट्टी का चूल्हा, बैल से खेती, बायोस्कोप, चिट्ठी और साइकिल का टायर वाला बचपन. यही वजह है कि गणपति बप्पा के सामने सजी यह 1980s थीम पुरानी पीढ़ी के लिए यादें और नई पीढ़ी के लिए एक अलग अनुभव बन गई है.
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