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Manchaha Var ke Upay: मनचाहा वर पाने के लिए करें इस चौपाई का पाठ, इसका एक-एक शब्द है प्रभावी, सीता जी ने की थी उपासना

देवी दुर्गा भक्तवत्सल हैं और जो भी भक्त श्रद्धा से मां की इस चौपाई का पाठ नवरात्रि के इस दिन करते हैं, उन्हें मनचाहा वर मिलता है. साथ ही घर में सुख और शांति का भी वास होता है.

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मां महागौरी मां महागौरी

तुलसीदास जी की रामचरितमानस में माता सीता की गौरी पूजा का प्रसंग बेहद खास और प्रचलित है. जब भगवान राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ जनकपुर पहुंचते हैं, तब माता सीता गौरी पूजन के लिए जाती हैं. वहां वह मां पार्वती की स्तुति करते हुए कहती हैं, 'जय जय गिरिवर राज किशोरी, जय महेश मुख चंद्र चकोरी...' इस चौपाई में माता सीता मां गौरी की महिमा का गुणगान करती हैं और मन ही मन भगवान राम को अपने पति के रूप में पाने की कामना करती हैं. पुराणों में कहा गया है कि मां गौरी की इस स्तुति को गाने से मनोकामना पूर्ण होती है. अगर आप भी अपने मनचाहे वर की कामना कर रही हैं, तो नवरात्रि के आठवें दिन यानी 18 अक्टूबर 2026, रविवार को विधि-विधान के साथ मां महागौरी की पूजा करें और इस चौपाई का पाठ करें. मां के अन्य रूपों की तरह महागौरी का स्वरूप भी अत्यंत सौम्य माना जाता है और उनकी आराधना सुखी वैवाहिक जीवन व मनचाहे जीवनसाथी की कामना को पूर्ण करती है.

सबसे पहले समझें 'जय-जय गिरिराज किशोरी' का अर्थ
इस चौपाई में माता सीता मां पार्वती की स्तुति करती हैं. 'गिरिराज किशोरी' का अर्थ है पर्वतराज हिमालय की पुत्री, यानी माता पार्वती. 'जय महेश मुख चंद्र चकोरी' में मां को भगवान शिव के मुखरूपी चंद्रमा को निहारने वाली चकोरी के रूप में संबोधित किया गया है. यहां तुलसीदास जी ने मां पार्वती के प्रति श्रद्धा और उनके शिव से जुड़ाव को सुंदर उपमा के जरिए व्यक्त किया है. तुलसीदास जी ने इस प्रसंग के जरिए माता सीता की भक्ति, उनकी विनम्रता और मां गौरी पर उनके विश्वास को दर्शाया है. माता सीता अपने मन की इच्छा मां के सामने रखती हैं और भगवान राम को पति रूप में पाने की कामना करती हैं, जिससे खुश होकर मां गौरी देवी सीता को मनचाहा वर पाने का वरदान देती हैं. न केवल वर की इच्छा पूर्ण होती है, बल्कि इस चौपाई का नित्य पाठ करने से घर में सुख और शांति आती है.

जय जय गिरिवर राज किशोरी, जय महेश मुख चंद चकोरी॥
-हे हिमालयराज की पुत्री माता गौरी, आपकी जय हो. आप भगवान शिव की प्रिय हैं और उनके मुखरूपी चंद्रमा को निहारने वाली चकोरी के समान हैं.

जय गजबदन षडाननमाता, जगत जननी दामिनी दुति गाता॥
-हे भगवान गणेश और कार्तिकेय की माता, आपकी जय हो. आप पूरे संसार की जननी हैं और आपका तेज बिजली की चमक जैसा है.

नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
-हे माता, आपकी महिमा का न कोई आरंभ है, न मध्य और न अंत. आपका प्रभाव इतना असीम है कि वेद भी उसे पूरी तरह नहीं जान पाए.

भव भव विभव पराभव कारिनि, विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
-हे देवी, आप संसार में सुख-समृद्धि और बदलाव की कारक हैं. आपकी माया पूरे विश्व को मोहित करती है और आप अपनी इच्छा से विचरण करती हैं.

सेवत तोहि सुलभ फल चारी, बरदायनी पुरारी पिआरी॥
-हे माता, आपकी भक्ति से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थ प्राप्त हो सकते हैं. आप वरदान देने वाली और भगवान शिव की प्रिय हैं.

देबि पूजि पद कमल तुम्हारे, सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
-हे देवी, आपके कमल जैसे चरणों की पूजा करने से देवता, मनुष्य और ऋषि सभी सुख और शांति पाते हैं.

मोर मनोरथु जानहु नीकें, बसहु सदा उर पुर सबहीं के॥
-हे माता, आप मेरे मन की इच्छा अच्छी तरह जानती हैं. आप सभी के हृदय में हमेशा निवास करती हैं.

कीन्हेउं प्रगट न कारन तेहीं, अस कहि चरन गहे बैदेही॥
-सीता जी ने अपनी मनोकामना सीधे नहीं बताई. इतना कहकर उन्होंने माता गौरी के चरण पकड़ लिए.

बिनय प्रेम बस भई भवानी, खसी माल मूरति मुसकानी॥
-सीता जी की विनती और प्रेम से माता भवानी प्रसन्न हो गईं. माता की प्रतिमा मुस्कुराने लगी और उनके गले की माला खिसक गई.

यहां पर देवी भविष्यवाणी करती हैं जो केवल सीता जी सुन सकती हैं

सादर सियं प्रसादु सिर धरेऊ, बोली गौरि हरषु हियं भरेऊ॥
-सीता जी ने आदरपूर्वक प्रसाद अपने सिर पर रखा. माता गौरी का हृदय प्रसन्नता से भर गया और उन्होंने सीता जी से बात की.

सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूजिहिं मनकामना तुम्हारी॥
-माता गौरी ने सीता जी से कहा कि उनका आशीर्वाद सत्य होगा और उनके मन की इच्छा अवश्य पूरी होगी.

नारद बचन सदा सुचि साचा, सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
- देवर्षि नारद के वचन हमेशा सत्य होते हैं. सीता जी को वही वर मिलेगा, जिसे उनका मन पसंद करता है.

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर सांवरो॥
-माता गौरी ने आशीर्वाद दिया कि सीता जी को वही वर मिलेगा, जिसे उनका मन चाहता है. वह सहज रूप से सुंदर और सांवले रंग का होगा.

करुना निधान सुजान सीलु सनेह जानत रावरो॥
-वह दया का भंडार, समझदार, अच्छे स्वभाव वाला और प्रेम की भावना को समझने वाला होगा.

एहि भांति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियं हरषीं अली॥
-माता गौरी का आशीर्वाद सुनकर सीता जी और उनकी सखियां बहुत प्रसन्न हुईं.

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
-सीता जी ने बार-बार माता भवानी की पूजा की और प्रसन्न मन से वहां से लौट चलीं.

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाय कहि॥
-माता गौरी को अपने अनुकूल जानकर सीता जी इतनी प्रसन्न हुईं कि उनकी खुशी का वर्णन करना मुश्किल था.

मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥
-सीता जी के बाएं अंग फड़कने लगे, जिसे उस प्रसंग में शुभ संकेत माना गया.

इन चौपाई का क्या है महत्व?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां गौरी को वैवाहिक सुख और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से जोड़कर देखा जाता है. माता सीता ने भी स्वयंवर से पहले मां गौरी की पूजा की थी और भगवान राम को पति रूप में पाने की इच्छा जताई थी. इसी वजह से कई भक्त इस चौपाई का पाठ मनचाहा वर पाने के लिए करते हैं.

इस दिन करें पाठ
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है. इस दिन भक्त श्रद्धा के साथ मां की आराधना करते हैं और अपने मन की इच्छाएं उनके सामने रखते हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना से मन को शांति और विश्वास मिलता है. अगर आप भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना करती हैं, तो मां महागौरी की पूजा के साथ इस चौपाई का पाठ कर सकती हैं. पूजा करते समय मन में श्रद्धा रखें और अपनी कामना मां के सामने विनम्रता और शुद्धता से व्यक्त करें. मां भक्तवत्सल हैं और सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना सुनती हैं.
 

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