
श्री श्री 108 बड़ी दुर्गा, मुंगेर का इतिहास
श्री श्री 108 बड़ी दुर्गा, मुंगेर का इतिहास
बिहार के मुंगेर स्थित 400 साल पुरानी 'श्री श्री 108 बड़ी दुर्गा महारानी' मंदिर में नवरात्रि पर देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं. यह मंदिर मुंगेर ही नहीं पूरे बिहार में आस्था का अपने आप में विशेष महत्व रखता है. बिहार के हर घर में आपको माता की तस्वीर मिल जाएगी. मंदिर में स्थापित इस मंदिर का इतिहास रहा है कि एकादशी को सूर्य की किरण धरती पर पड़ने के बाद ही मां का विसर्जन किया जाता है. इतना ही नहीं आस्था के केंद्र होने वाली मां की श्रृंगार भी अद्भुत होता है. बड़ी-बड़ी आंखें और हाथ में त्रिशूल ली मां की प्रतिमा साक्षात ब्रह्म का स्वरूप लगती है. जब विसर्जन के लिए मां लाल-लाल सितारों वाली चुनरी ओढ़कर नगर भ्रमण पर निकलती हैं तो पूरा शहर उनके दर्शन के लिए थम जाता है.
बिहार के मुंगेर जिले के सादीपुर में स्थित श्री श्री 108 बड़ी दुर्गा महारानी का मंदिर आस्था, परंपरा और सामाजिक भाईचारे का भी अनूठा मिसाल है. यहां माता की पूजा करीब 400 साल से होती आ रही है. पूजा के आयोजक बताते हैं कि मंदिर की स्थापना का कोई सटीक समय किसी को मालूम नहीं है. लेकिन मान्यता है कि यहां पूजा अनादि काल से चली आ रही है. नवरात्रि में माता के दर्शन के लिए बिहार के अलग-अलग जिलों के साथ देश-विदेश से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. माता की महिमा ऐसी है कि मुंगेर के लगभग हर घर में उनकी तस्वीर देखने को मिल जाती है. यहां की पूजा से लेकर विसर्जन तक की परंपराएं अपने आप में खास हैं. सबसे अनोखी बात यह है कि माता की प्रतिमा किसी वाहन या ट्रैक्टर से नहीं, बल्कि 32 कहारों के कंधों पर उठाकर सोझी घाट तक ले जाई जाती है. इस पूजा में हिंदू-मुस्लिम भाई चारे की मिसाल भी पेश करती है.
400 साल पुरानी परंपरा-
समिति के अध्यक्ष राजेश कुमार दास बताते हैं कि मुंगेर के सादीपुर स्थित बड़ी दुर्गा महारानी के मंदिर और यहां होने वाली पूजा का इतिहास करीब 400 साल पुराना है. जानकारी के मुताबिक बाद में साल 1841 में दरभंगा महाराज ने यहां मंदिर का निर्माण कराया था. हालांकि, मूल मंदिर की स्थापना का सटीक समय किसी को मालूम नहीं है और यहां पूजा की परंपरा बहुत पुरानी मानी जाती है. मंदिर के आसपास मुस्लिम आबादी होने के बावजूद यह स्थान सामाजिक सह-अस्तित्व और भाईचारे का प्रतीक बना हुआ है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां मंदिर में आरती और पास के मस्जिद में अजान एक साथ होता है.

महिषासुर मर्दिनी स्वरूप में विराजती हैं माता-
नवरात्रि में बड़ी दुर्गा महारानी के मंदिर में माता की प्रतिमा महिषासुर मर्दिनी स्वरूप में स्थापित की जाती है. बताया जाता है कि पिछले करीब 400 वर्षों से माता की प्रतिमा का स्वरूप लगभग एक जैसा ही रहता है. भले ही कारीगर बदले, लेकिन मूर्ति की बारीकियां नहीं बदलती.
माता का श्रृंगार भी खास पहचान है, जहां माता के पूरे आभूषण सोने और चांदी के बनाए जाते हैं. वहीं, माता की कलाई में पहनाया जाने वाला कंगन मिट्टी का होता है. इसके पीछे पुरानी परंपरा का बताई जाती है. नवरात्रि के दौरान मंदिर समिति की ओर से माता की महिषासुर मर्दिनी स्वरूप वाली प्रतिमा बनाई जाती है.
मंदिर में काले पत्थर की प्राचीन प्रतिमा-
मंदिर में मां दुर्गा की एक बेहद पुरानी प्रतिमा काले पत्थर की बनी हुई है, जो दीवार में स्थापित है. इसके साथ भगवान दत्तात्रेय (हिन्दू धर्म में एक प्रमुख और पूजनीय देव हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है) की प्रतिमा भी मौजूद है. इस काले पत्थर की प्रतिमा को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि इसे कब और किसने स्थापित किया था? इसे मंदिर में स्वयं प्रकट हुई प्रतिमा के रूप में भी बताया जाता है. मंदिर में साल के 12 महीने देवी के श्रृंगार रूपी स्वरूपी सिर की पूजा होती है.
कलश स्थापना से निशा पूजा तक, हर रस्म का अपना महत्व-
मंदिर में कलश स्थापना के बाद नवरात्रि की सातवीं पूजा पर माता की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. इसी दिन मुंगेर में बड़ी दुर्गा महारानी के दरबार में निशा पूजा होने की परंपरा रही है. यह पूजा रात करीब 11 बजे से सुबह 1 बजे के बीच तक चलती है. इस पूजा में .तरकी का जल. खास माना जाता है. श्रद्धालु इसे बहुत विश्वास और आस्था के साथ लेते हैं और अपने घर ले जाकर शुभ कार्यों में इसका इस्तेमाल करते हैं. लोगों की मान्यता है कि इस जल को घर में रखने या शुभ कार्यों में उपयोग करने से सुख-शांति बनी रहती है.
इस बार पूजा 11 दिनों की होने और अष्टमी की पूजा दो दिन पड़ने के कारण निशा पूजा अष्टमी को होने जा रही है. पहले यह पूजा सप्तमी को होती थी, इसलिए कुछ श्रद्धालुओं को तारीख में बदलाव को लेकर परेशानी हो रही है. हालांकि, कैलेंडर और शास्त्रों के मुताबिक इस बार निशा पूजा अष्टमी को होनी है.
केंद्रीय प्रतिमा विसर्जन समिति के अध्यक्ष राजेश कुमार दास के मुताबिक सप्तमी के दिन प्राण प्रतिष्ठा की पूजा पूरी होने के बाद माता के स्वरूप में एक अलग ही निखार दिखाई देता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता को जिस भाव और रूप में देखना चाहें, उसी तरह उनका दिव्य स्वरूप नजर आता है. इसी आस्था के साथ भक्त माता के दर्शन करते हैं और उनसे सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

32 कहारों के कंधों पर निकलती है विसर्जन यात्रा-
बड़ी दुर्गा महारानी की विसर्जन यात्रा मुंगेर की सबसे खास परंपराओं में से एक है. विजयादशमी की शाम को माता की भव्य शोभायात्रा निकलती है. प्रतिमा को किसी वाहन या ट्रैक्टर पर नहीं रखा जाता, बल्कि 32 कहार अपने कंधों पर उठाकर पूरे शहर का भ्रमण करने के बाद सोझी घाट तक ले जाते हैं. बड़ी दुर्गा की मूर्ति लगभग 25 फीट ऊंची होती है और वजन में 2000 किलो से ज्यादा होती है. इस परंपरा में कहारों की संख्या को लेकर भी विशेष नियम है. राजेश कुमार के अनुसार न एक कहार ज्यादा होता है और न ही एक कम, 32 कहार ही कई वर्षों मां के प्रतिमा के आपने कंधे पर उठाकर सारी रात घूमते हैं. हालांकि इसमें मूर्ति को उठाने में और भी शामिल होते हैं लेकिन 32 कहारों का होना आवश्यक है. माता की विसर्जन यात्रा दशमी की शाम से शुरू होकर एकादशी की दोपहर तक चलती है. पूर्ण श्रृंगार करके और लाल-लाल सितारों वाली चुनरी ओढ़कर जब मां अपने स्थान से निकलती हैं तो पूरा शहर उनके दर्शन के लिए थम जाता है.
विसर्जन यात्रा के दौरान मुंगेर की चार प्रमुख माताओं की प्रतिमाएं कोड़ा मैदान गोला पर मिलती हैं. इनमें बड़ी दुर्गा महारानी, बड़ी काली महारानी, छोटी दुर्गा महारानी और छोटी काली महारानी शामिल हैं. इन प्रतिमाओं का एक स्थान पर मिलने के बाद ही विसर्जन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है. राजेश के मुताबिक मुंगेर में विसर्जन के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है. इसे व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने के लिए जिला प्रशासन ने साल 1989 में केंद्रीय प्रतिमा विसर्जन समिति, मुंगेर की स्थापना की थी. समिति की ओर से सभी प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए नंबर और समय-सारणी तय करने में जिला प्रशासन को सहयोग दिया जाता है.
कर्फ्यू के दौरान भी नहीं हिली माता की प्रतिमा-
माता की प्रतिमा को लेकर एक पुरानी घटना भी बताई जाती है. एक बार कर्फ्यू के दौरान प्रतिमा को ट्रक से विसर्जन के लिए ले जाने की कोशिश की गई. लेकिन प्रतिमा को वह जरा भी नहीं हिला पाएं. इसके बाद अगले दिन कहारों को बुलाया गया और परंपरा के मुताबिक उनके कंधों पर प्रतिमा उठाकर ले जाई गई. इस घटना को श्रद्धालु माता की महिमा और पुरानी परंपरा से जोड़कर देखते हैं. तभी से 32 कहारों के कंधों पर प्रतिमा ले जाने की परंपरा और ठोस हो गई है. प्रतिमा का इतिहास रहा है कि एकादशी को सूर्य कि किरण पड़ने के बाद ही विसर्जन होता है. उससे पहले दशमी की पूरी रात माता की मूर्ति को उठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है.
एक ही फैमिली पीढ़ियों से कर रही है पूजा-पाठ
मंदिर में पूजा करवाने वाले पंडित एक ही फैमिली आते हैं और कई सालों से मंदिर में सेवा दे रहे हैं. पुजारी परिवार के पूर्वजों ने लंबे समय तक माता की पूजा की है. आयोजकों के मुताबिक, पंडित नीलांबर पूर्वजों के समय से ही यहां पूजा करवाते आ रहे हैं. अब उनके परिवार की अगली पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है. उनके अनुसार, अब उनके पोते दीपक अरलालु पुजारी के रूप में पूजा करा रहे हैं, जबकि नवरात्रि के दस दिनों तक पंडित नीलांबर खुद माता की पूजा करते हैं.
देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु-
स्थानीय लोगों के मुताबिक बड़ी दुर्गा महारानी के दर्शन के लिए मुंगेर के अलावा खगड़िया, लखीसराय, जमुई, बेगूसराय और भागलपुर से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. बिहार के दूसरे हिस्सों के साथ देश के अन्य राज्यों और विदेशों से भी लोग माता के दर्शन और पूजा में शामिल होने आते हैं. मिथिला और अंग क्षेत्र समेत पूरे बिहार में घरों में माता की तस्वीर देखने को मिलती है. मुंगेर के लगभग हर घर में माता की तस्वीर होती है. श्रद्धालु अपनी इच्छा से माता की पूजा और दर्शन करते हैं, फिर शुभ कार्यों की शुरुआत करते हैं. कलश का जल भी लोग श्रद्धा के साथ घर ले जाते हैं और सुख-शांति की कामना से उसका छिड़काव करते हैं. श्री श्री 108 बड़ी दुर्गा महारानी का मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि करीब चार सौ साल पुरानी परंपरा, आस्था और सामाजिक भाईचारे की पहचान बना चुका है.
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