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Sawai Madhopur Shiwar Ghushmeshwar Temple: देश का 12वां ज्योतिर्लिंग होने का दावा, सावन में सवाई माधोपुर के घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

घुश्मेश्वर महादेव मंदिर सावन में आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. मंदिर को 12वें ज्योतिर्लिंग के रूप में मानने का दावा किया जाता है. श्रावण महोत्सव के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर जलाभिषेक और पूजा-अर्चना कर रहे हैं. मंदिर के इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और शिवपुराण में वर्णित तथ्यों के आधार पर इसे घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग बताया जाता है. मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि यहां आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं भगवान शिव अवश्य पूरी करते हैं.

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Sawai madhopur shiwar ghushmeshwar mahadev temple Sawai madhopur shiwar ghushmeshwar mahadev temple

सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव को देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. वर्षभर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में अपनी हाजिरी लगाकर मनोकामना मांगते हैं. वहीं, शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर आसपास के लोगों के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र है. श्रावण मास में यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ रहती है. ऐसे में इन दिनों शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है. घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को लेकर पेश है एक विशेष रिपोर्ट.

श्रावण महोत्सव में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़, जानिए मंदिर का पौराणिक इतिहास
सवाई माधोपुर के शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर देशभर में 12वें ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है. वैसे तो वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास में यहां शिवभक्तों की विशेष भीड़ रहती है. श्रावण मास में यहां एक माह तक श्रावण महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जो इन दिनों चल रहा है. इन दिनों आयोजित श्रावण महोत्सव के दौरान भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए दूर-दराज सहित आसपास के लोग बड़ी संख्या में मंदिर पहुंच रहे हैं. श्रद्धालु शिव आराधना कर भगवान शिव से अपने और अपने परिवार की कुशलक्षेम की कामना कर रहे हैं.

इस मंदिर का इतिहास भी अपने आप में बेहद अद्भुत है. घुश्मेश्वर महादेव मंदिर के इतिहास की बात करें तो देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नामक ब्राह्मण रहा करते थे. उनकी पत्नी का नाम सुधर्मा था. संतान सुख से वंचित रहने के कारण उन्हें लोगों के व्यंग्य-बाण सुनने पड़ते थे. इससे व्यथित होकर सुधर्मा ने अपनी छोटी बहन सुषमा का विवाह अपने पति से करवा दिया. सुषमा भगवान शंकर की अनन्य भक्त थीं. कुछ समय पश्चात उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. लेकिन सुधर्मा को लगा कि पुत्र मोह के कारण उनकी बहन के प्रति प्रेम कम होता जा रहा है. तब सुधर्मा ने अपनी बहन के पुत्र की हत्या कर उसका शव सरोवर में फेंक दिया.

रक्तरंजित शैया देखकर जब पुत्रवधू ने अपनी सास सुषमा को इसकी जानकारी दी, तो सुषमा ने भगवान शिव की तपस्या की. आकाशवाणी से उन्हें पता चला कि उनके पुत्र की हत्या सुधर्मा ने की है. भगवान शिव ने सुधर्मा का अंत करने की बात कही, लेकिन सुषमा ने प्रार्थना की कि प्रभु, आप केवल उनकी बुद्धि सही कर दें. इस पर भगवान शिव प्रसन्न हुए और कहा कि आज से मैं तुम्हारे नाम से इसी स्थान पर निवास करूंगा और लोगों का कल्याण करूंगा.

900 साल पुराना बताया जाता है मंदिर, देवगिरि पर्वत भी है आकर्षण का केंद्र
घुश्मेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास अपने आप में बेहद अद्भुत है. यह मंदिर तकरीबन 900 वर्ष पुराना बताया जाता है. यहां मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू माने जाते हैं. बताया जाता है कि घुश्मा की तपस्या से भगवान शिव का प्राकट्य हुआ था. इस शिवलिंग को पाताल से जुड़ा हुआ माना जाता है. वेदों और उपनिषदों में भी शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर का वर्णन मिलता है. बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास आदिकाल से जुड़ा है. महर्षि वेदव्यास ने भी उपनिषदों में इस मंदिर का उल्लेख किया है. इस मंदिर परिसर में स्थित देवगिरि पर्वत भी लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है. पहाड़ पर स्थित देवी मंदिर को मंदिर ट्रस्ट ने विकसित कर विशेष आकर्षण का केंद्र बनाया है. यहां विभिन्न देवी-देवताओं की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं.

12वें ज्योतिर्लिंग को लेकर अलग-अलग दावे, मंदिर ट्रस्ट ने रखे अपने पक्ष
मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था जुड़ी हुई है. वहीं, शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को लेकर कई तरह की किंवदंतियां भी प्रचलित हैं. कहा जाता है कि भगवान शिव के द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का नाम 'घुश्मेश्वर' है. हालांकि, इस ज्योतिर्लिंग के स्थान को लेकर कई दावे और आपत्तियां भी प्रचलित हैं. कुछ लोग राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के शिवाड़ स्थित शिवालय घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को द्वादश ज्योतिर्लिंग मानते हैं. वहीं, कुछ लोगों का दावा है कि घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के दौलताबाद के बेरूलठ गांव के पास स्थित है. महाराष्ट्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह ज्योतिर्लिंग अजंता और एलोरा की गुफाओं के समीप देवगिरि के पास स्थित तड़ाग में है. शिवमहापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है. ज्योतिर्लिंग 'घुश्मेश' के समीप एक सरोवर होने का भी उल्लेख है, जिसे शिवालय कहा गया है. कहा जाता है कि मंदिर का जीर्णोद्धार 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी पुण्यश्लोका देवी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया था.

राजस्थान के शिवाड़ में द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का दावा करने वालों का कहना है कि प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग 'श्री घुश्मेश्वर' सवाई माधोपुर जिले के ईसरदा के पास शिवाड़ में स्थित है. उनका कहना है कि शिवाड़ प्राचीन काल में शिवालय नाम से जाना जाता था, जिसका उल्लेख शिवपुराण में ईश्वरद्वार के नाम से मिलता है. शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को 12वें ज्योतिर्लिंग के रूप में मानने वालों सहित मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष प्रेम प्रकाश शर्मा का दावा है कि शिवपुराण की कोटि रुद्र संहिता के अध्याय 32-33 के अनुसार घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय नामक स्थान पर होना चाहिए.

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के दक्षिण में देवत्व गुणों वाला देवगिरि पर्वत बताया गया है. शिवाड़ स्थित ज्योतिर्लिंग मंदिर के दक्षिण में भी तीन श्रृंगों वाला देवगिरि नामक पर्वत स्थित है. किंवदंती है कि महाशिवरात्रि पर यह पर्वत एक पल के लिए सुवर्णमय हो जाता है. इसकी पुष्टि बणजारे की कथा में होने की बात कही जाती है. बताया जाता है कि देवगिरि से मिले स्वर्ण प्रसाद से ज्योतिर्लिंग की प्राचीरें और ऋणमुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण कराया गया.

शिवपुराण की कोटि रुद्र संहिता के अध्याय 33 के अनुसार घुश्मेश्वर प्रादुर्भाव कथा में भगवान शिव ने घुश्मा को वरदान दिया था कि 'घुश्मे, मैं तुम्हारे नाम से घुश्मेश्वर कहलाता हुआ यहां निवास करूंगा. सबके लिए सुखदायक होऊंगा. यह सरोवर शिवलिंगों का आलय होगा और तीनों लोकों में शिवालय के नाम से प्रसिद्ध होगा.' बताया जाता है कि वर्ष 1837 में ग्राम शिवाड़ स्थित सरोवर की खुदाई के दौरान यहां दो हजार शिवलिंग मिले थे, जो इसके शिवलिंगों का आलय होने की पुष्टि करते हैं. स्थानीय लोगों का तर्क है कि उनके पक्ष में कई पुराणों और कथाओं में वर्णन मिलता है. श्री घुश्मेश्वर महात्म्य के अनुसार ज्योतिर्लिंग क्षेत्र शिवालय में चारों दिशाओं में चार द्वार थे. इस आधार पर क्षेत्र के चार द्वार बताए जाते हैं, पूर्वी द्वार सारसोप, उत्तरी द्वार बहड़, तीसरा नटवाड़ा और चौथा ईसरदा. इसके अलावा वशिष्ठी नदी, मंदार वन और सुररार सरोवर का भी उल्लेख शिवपुराण में मिलता है, जिनकी पहचान स्थानीय स्थानों से की जाती है.

मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष प्रेम प्रकाश शर्मा का कहना है कि शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर ही वास्तविक 12वां ज्योतिर्लिंग है. उनका दावा है कि इसका प्रमाण पुराणों और उपनिषदों में भी मिलता है. साथ ही, विभिन्न धर्मगुरु और देश के कई शंकराचार्य भी शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को ही 12वां ज्योतिर्लिंग मानते हैं.

श्रावण महोत्सव में हो रहे धार्मिक आयोजन, श्रद्धालुओं के लिए की गई विशेष व्यवस्था
शिवाड़ स्थित घुश्मेश्वर महादेव मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था जुड़ी हुई है. सालभर मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं, लेकिन श्रावण महोत्सव के दौरान मंदिर ट्रस्ट की ओर से पूरे एक माह तक विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. घुश्मेश्वर महादेव मंदिर के बारे में लोगों का मानना है कि जिसने भी सच्चे मन से भगवान शिव के दरबार में अपनी हाजिरी लगाई, उसकी झोली कभी खाली नहीं रही. श्रावण मास में आयोजित श्रावण महोत्सव को लेकर इन दिनों सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन मंदिर पहुंच रहे हैं और शिव आराधना कर रहे हैं. शिवभक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए आक, धतूरा और बिल्वपत्र अर्पित कर पूजा-अर्चना कर रहे हैं. मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष प्रेम प्रकाश शर्मा का कहना है कि श्रावण महोत्सव के दौरान मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ट्रस्ट द्वारा समुचित व्यवस्थाएं की गई हैं, जिसमें प्रशासन का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है.
 

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