Surat Ganesh Temple
Surat Ganesh Temple
सूरत में समुद्र के बीच एक टापू पर गणपति मंदिर बना है, जहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को करीब 1 से 2 किलोमीटर का मुश्किल सफर तय करना पड़ता है. पहले नाव से समुद्र पार करना होता है और इसके बाद लकड़ी से बनाए गए छोटे-छोटे रास्तों और कई जगह घुटनों तक के कीचड़ से होकर मंदिर तक पहुंचना पड़ता है. इस पूरी यात्रा में करीब 30 से 40 मिनट लगते हैं. मुश्किल रास्ते के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
नाव से समुद्र पार फिर शुरू होता है असली सफर
यह मंदिर सूरत के डूमस इलाके के आलियाबेट में स्थित बताया जाता है. यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालु डूमस गांव के नाविक क्लब के घाट से नाव लेते हैं. मंदिर से जुड़े सेवक प्रतीक खलासी के मुताबिक, उनकी ओर से श्रद्धालुओं के लिए नाव की सेवा निशुल्क है.
समुद्र पार करने के बाद टापू पर पहुंचते ही रास्ता आसान नहीं रहता. बारिश या समुद्र में पानी बढ़ने पर कई जगह कीचड़ जमा हो जाता है. श्रद्धालुओं को लकड़ी से बनाए गए छोटे-छोटे रास्तों से गुजरना पड़ता है. कई जगह पानी और कीचड़ के बीच से आगे बढ़ना पड़ता है.
50 साल पुरानी है गणपति की प्रतिमा से जुड़ी मान्यता
मंदिर से जुड़े सेवक के मुताबिक, यहां गणपति की प्रतिमा करीब 40 से 50 साल पहले समुद्र के रास्ते बहकर आई थी. स्थानीय मछुआरों ने प्रतिमा को देखा और उसे एक पेड़ के नीचे रख दिया. अगले दिन जब मछुआरे वहां पहुंचे तो प्रतिमा उसी जगह मिली. तीसरे दिन भी वह वहीं मौजूद थी. इसके बाद लोगों को लगा कि यह कोई सामान्य घटना नहीं है. बताया जाता है कि प्रतिमा का तीन बार विसर्जन किया गया, लेकिन हर बार वह वापस उसी स्थान पर मिल गई.
समुद्र का पानी 4-5 फीट चढ़ा फिर भी नहीं हिली प्रतिमा
स्थानीय लोगों के मुताबिक, जिस जगह प्रतिमा रखी गई थी, वहां समुद्र का पानी कई बार 4 से 5 फीट तक चढ़ जाता था. इसके बावजूद लकड़ी की प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिलती थी. लोगों ने इसे गणपति बप्पा का चमत्कार माना और प्रतिमा को उसी स्थान पर स्थापित कर पूजा शुरू कर दी. धीरे-धीरे आसपास के गांवों के लोग भी इस मंदिर से जुड़ते गए. समय के साथ इसकी मान्यता सूरत के दूसरे इलाकों तक पहुंची और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई.
हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं
प्रतीक खलासी के मुताबिक, अब हर साल करीब 8 से 10 हजार श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. लोग दूर-दराज के इलाकों से नाव के जरिए मंदिर तक आते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है. समुद्र, कीचड़ और करीब दो किलोमीटर के मुश्किल रास्ते के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं होती. कई भक्त परिवार के साथ यहां पहुंचते हैं और दर्शन के बाद शांति का अनुभव बताते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर की मान्यता और यहां से जुड़ी कहानी एक-दूसरे तक पहुंचने के कारण हर साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है.
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