Ujjain
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मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के तट पर बसा उज्जैन देश की सात पवित्र पुरियों यानी सप्त पुरियों में शामिल है. यहां भगवान शिव स्वयं ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजित हैं. प्राचीन समय से ही उज्जैन में सिंहस्थ महाकुंभ का आयोजन होता आया है. मान्यता है कि देवताओं और दानवों ने जब समुद्र मंथन किया, तब उसमें से अमृत का घट निकला था. इसे पाने के लिए देव और दानवों के बीच युद्ध हुआ. इसी दौरान अमृत कलश से कुछ बूंदें पवित्र शिप्रा नदी में छलक गईं. इसी वजह से उज्जैन में कुंभ मेले का आयोजन होता है. इतिहासविदों के अनुसार, पुराणों में मोक्ष प्रदान करने वाली सप्त पुरियों में उज्जैन का भी उल्लेख मिलता है. इसी कारण इसे पारंपरिक रूप से एक प्राचीन नगरी माना जाता है और हर 12 साल पर यहां कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.
बाबा महाकाल और मां हरसिद्धि का धाम
उज्जैन में बाबा महाकाल की पूजा काल को नियंत्रित करने वाले देवता के स्वरूप में की जाती है. अगर उज्जैन की प्राचीनता और प्रसिद्धि की बात करें तो द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण भी शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहां आए थे. इसी नगर में मां हरसिद्धि का मंदिर शक्तिपीठ के स्वरूप में विराजित है. इतिहासकारों के मुताबिक शैव, वैष्णव और शाक्त परंपराओं का अनूठा संगम उज्जैन के महत्व को और बढ़ाता है.
श्रीकृष्ण ने यहीं हासिल किया था ज्ञान
विभिन्न पुराणों में उल्लेख मिलता है कि आज से पांच हजार पांच सौ साल पहले भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ शिक्षा ग्रहण करने के लिए उज्जैन आए थे. इसी पवित्र भूमि पर उन्होंने 64 कलाओं और 14 विद्याओं का ज्ञान अल्प समय में प्राप्त किया था. बाद में वे योगेश्वर कहलाए और गीता में संदेश दिया. इसी पवित्र नगर में भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता सुदामा जी से हुई थी. आज भी महर्षि सांदीपनि के आश्रम में गुरुजी के साथ श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं.
चार प्रमुख स्थानों पर लगता है कुंभ
इतिहासकार बताते हैं कि देश में चार महत्वपूर्ण स्थान हैं, जहां कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है. इनमें हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन शामिल हैं. स्कंद पुराण के अनुसार, शिप्रा तट पर जहां पहले महाकाल वन हुआ करता था, उसी स्थान पर अमृत का वितरण हुआ था. इन चारों स्थानों में उज्जैन का महत्व अधिक बताया गया है.
कुंभ मेले का इतिहास कितना पुराना?
कुंभ मेले के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को पूरी तरह बता पाना आसान नहीं है. इसका आयोजन कब से शुरू हुआ, इसे लेकर विद्वानों में कई भ्रांतियां हैं. वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ स्नान के दौरान आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था. कुछ विद्वान गुप्तकाल में कुंभ के सुव्यवस्थित होने की बात कहते हैं. हालांकि, प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ईसा पूर्व के समय से प्राप्त होते हैं. बाद में श्रीमद् आद्य जगतगुरु शंकराचार्य और उनके शिष्यों ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की थी. इससे यह माना जा सकता है कि कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है.
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