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गणेश जी की सवारी मूषक ही क्यों? छोटी-सी सवारी के पीछे छिपा है बड़ा रहस्य, जानिए क्या है पौराणिक मान्यता

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, मूषक पहले एक गंधर्व था, जिसे श्राप के कारण मूषक बनना पड़ा. बाद में वह गणेश जी का वाहन बना. प्रतीकात्मक रूप से चूहा बहुत चंचल और चीजों को कुतरने वाला माना जाता है, इसलिए इसे मनुष्य की इच्छाओं, चंचल मन और अहंकार का प्रतीक भी माना गया.

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हाइलाइट्स
  • गणेशजी ने मूषक को बनाया अपना वाहन

  • गणेशजी की सवारी मूषक ही क्यों?

14 सितंबर से गणेश उत्सव की शुरुआत हो चुकी है. 10 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में घरों और पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है. गणेशजी को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का देवता माना जाता है. उनकी प्रतिमा में एक चीज खास तौर पर दिखाई देती है उनकी सवारी मूषक यानी चूहा. देखने में बेहद छोटा और साधारण लगने वाला यह जीव आखिर गणेशजी का वाहन क्यों बना? इसके पीछे सिर्फ पौराणिक कथा ही नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े कई गहरे संदेश भी छिपे हैं.

मूषक चंचल मन और इच्छाओं का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं में मूषक को मनुष्य की चंचल इच्छाओं और वासनाओं का प्रतीक माना गया है. जिस तरह चूहा लगातार इधर-उधर भागता रहता है और किसी एक जगह स्थिर नहीं रहता, उसी तरह मनुष्य का मन भी इच्छाओं के पीछे लगातार दौड़ता रहता है. गणेशजी का मूषक पर सवार होना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि बुद्धि और विवेक को इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए.

छोटा है, लेकिन किसी भी जगह पहुंच सकता है
मूषक का शरीर छोटा होता है और वह बहुत संकरी जगह में भी आसानी से पहुंच सकता है. इसी गुण को गणेशजी की बुद्धि से जोड़ा जाता है. भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है. इसका संदेश है कि समझदार व्यक्ति के लिए कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका रास्ता न निकाला जा सके. जैसे मूषक छोटी से छोटी जगह में पहुंच जाता है, वैसे ही सच्ची बुद्धि जटिल से जटिल समस्या की गहराई तक पहुंचकर उसका समाधान खोज सकती है.

कमजोर दिखने वाला मूषक देता है मेहनत का संदेश
मूषक आकार में छोटा और कमजोर दिखाई देता है, लेकिन उसके दांत इतने मजबूत होते हैं कि वह कठोर चीजों को भी कुतर सकता है. यही गुण मनुष्य के लिए एक बड़ा संदेश देता है. जीवन में साधन कम होने के बावजूद अगर मेहनत, धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो बड़ी से बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है. यानी सफलता के लिए हमेशा बड़े साधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि लगातार प्रयास और मजबूत इरादे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं.

अहंकारी गंधर्व से बना मूषक
मूषक को गणेशजी का वाहन बनने की एक पौराणिक कथा भी है. मान्यता के अनुसार, मूषक पहले क्रोंच नाम का एक गंधर्व था. एक बार वह देवराज इंद्र के दरबार में अप्सराओं के साथ हास-परिहास कर रहा था. इसी दौरान उसका पैर ऋषि वामदेव पर पड़ गया. ऋषि इससे क्रोधित हो गए और उन्होंने क्रोंच को चूहा बनने का श्राप दे दिया. श्राप के कारण क्रोंच मूषक बन गया. इसके बाद वह पराशर ऋषि के आश्रम में पहुंचा और वहां उत्पात मचाने लगा. उसने अनाज खा लिया, वस्त्रों को नुकसान पहुंचाया और आश्रम के ग्रंथों तक को कुतर डाला.

गणेशजी ने मूषक को बनाया अपना वाहन
मूषक के उत्पात से परेशान होकर ऋषियों ने भगवान गणेश से सहायता मांगी. गणेशजी ने अपना पाश फेंककर मूषक को पकड़ लिया. मूषक ने अपनी गलती स्वीकार की और गणेशजी से क्षमा मांगी. इसके बाद गणेशजी ने उसे अपना वाहन बना लिया. इस कथा को अहंकार और शक्ति के सही इस्तेमाल से जोड़कर देखा जाता है.

मूषक से मिलता है जीवन का बड़ा संदेश
गणेशजी और मूषक का संबंध केवल भगवान और उनके वाहन का संबंध नहीं माना जाता. इसमें मनुष्य के जीवन का दर्शन भी छिपा है. मूषक चंचल मन, इच्छाओं, अहंकार और छोटी-छोटी बाधाओं का प्रतीक है, जबकि गणेशजी बुद्धि, विवेक और ज्ञान के प्रतीक हैं. इसलिए गणेशजी का मूषक पर विराजमान होना यह संदेश देता है कि जब बुद्धि और विवेक मन की चंचलता, इच्छाओं और अहंकार पर नियंत्रण पा लेते हैं, तब जीवन की बाधाएं भी छोटी लगने लगती हैं.