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Garuda Purana Rituals: अंतिम संस्कार के बाद भी मुक्त नहीं होती आत्मा, घर में डाल लेती है डेरा... जानें गरुड़ पुराण में क्या है इसका मुख्य 5 कारण

हिंदू धर्म ग्रंथ गरुड़ पुराण में मानव मृत्यु और उसके पश्चात जीवात्मा की यात्रा का विस्तृत विवरण मिलता है. कई बार परिजनों द्वारा अंतिम संस्कार और पिंडदान करने के बाद भी ऐसा महसूस होता है कि दिवंगत की आत्मा आसपास ही मौजूद है.

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Why Souls Wander After Death Garuda Purana: हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद जिन आत्माओं को मुक्ति नहीं मिलती है, उनकी यात्रा को लेकर गरुड़ पुराण में विस्तार से बताया गया है. कई बार लोग बोलते हैं कि अंतिम संस्कार भी कर दिया, अंतिम विदाई भी पिंडदान के रूप में दे दिया, इसके बाद भी महसूस होता है कि परिजन की आत्मा आसपास है या भटक रही है. दरअसल गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा तुरंत हर स्थिति से मुक्त हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं होता है. कुछ परिस्थितियों में आत्मा अपने मोह, इच्छाओं और कर्मों के कारण प्रेत योनि में लंबे समय तक भटक सकती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसी स्थिति में आत्मा कहीं दूर नहीं जाती बल्कि अपने परिजनों और घर में ही कैद हो जाती है. वहीं कुछ आत्मा अपने जीवन में कभी कर्मों से परे हो जाती है, जो सीधे मुक्ति या संबंधित लोक की ओर निकल जाती है. 

हिंदू धर्म में कई तरीके के पिंडदान होते हैं. एक मृत्यु के तुरंत बाद श्राद्ध के दौरान पिंडदान होता है और दूसरा वार्षिक, जो आम तौर पर पितृ पक्ष के दौरान किया जाता है. लेकिन इसके बावजूद आत्मा को मुक्ति नहीं मिल पाती. लेकिन ऐसा क्यों होता है आइए इसे समझते हैं. 

1. शरीर और पारिवारिक मोह नहीं छूटता 
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद भी आत्मा का अपने शरीर और परिवार से मोह पूरी तरह खत्म नहीं होता. ऐसी मान्यता है कि आत्मा अपने अंतिम संस्कार को देखती है और कुछ समय तक अपने घर-परिवार के आसपास रहती है. इसी मोह को आत्मा के आगे की यात्रा में एक बड़ी बाधा माना जाता है. कई बार तो लोगों ने ऐसा भी बताया है कि उन्हें परिजन की मृत्यु के बाद भी उनके दर्शन हुए हैं. इसके पीछे यही कारण है कि वह अपने करीबी के पास ही रहती है.

2. मन में बसी अधूरी इच्छाएं
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उसके मन में इच्छाएं, मोह, क्रोध, लोभ या वासना जैसी भावनाएं बहुत ज्यादा रह जाएं, तो आत्मा को शांति मिलने में परेशानी होती है. ऐसी अतृप्त इच्छाओं वाली आत्मा मृत्यु और जीवन के बीच के चक्र में फंस कर प्रेत योनि में भटकने लगती है.

3. अकाल या असामान्य मृत्यु
धार्मिक मान्यता के अनुसार दुर्घटना, हत्या या आत्महत्या जैसी असामान्य मृत्यु के बाद भी आत्मा के प्रेत योनि में जाने की बात कही गई है. ऐसी मृत्यु में व्यक्ति की जीवन यात्रा अचानक रुक जाती है, जिससे उनके उम्र का चक्र पूरा नहीं होता. इसलिए अचानक मरने वाले लोगों की आत्मा की स्थिति को सामान्य मृत्यु से अलग माना गया है. ऐसी आत्मा परिजनों के पास भी नहीं आतीं, बल्कि जिस जगह और समय पर मौत हुई थी वहीं कैद हो जाती हैं. 

4. अंतिम संस्कार ठीक से न होना
केवल मोह या अकाल मृत्यु की कारण नहीं होता आत्मा के भटकने का. गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जिस व्यक्ति का अंतिम संस्कार नहीं हो पाता, या ठीक से नहीं होता उसकी आत्मा प्रेत बनकर भटकती रहती है. यही वजह है कि हिंदू परंपरा में मृत्यु के बाद दाह संस्कार के साथ आगे के कर्मकांडों को भी महत्व दिया जाता है.

5. श्राद्ध और पिंडदान न होना
गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं में श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व बताया गया है. माना जाता है कि मृत्यु के बाद किए जाने वाले पिंडदान से आत्मा की आगे की यात्रा के लिए सूक्ष्म शरीर तैयार होता है. अगर मृतक के लिए श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्म न किए जाएं, तो अतृप्त आत्मा के भटकने की उम्मीद ज्यादा होती है.

मुक्ति के लिए क्या करना होता है उपयुक्त
गरुड़ पुराण में गयाजी का भी विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार गया जाकर पिंडदान और श्राद्ध करने से पितरों को सद्गति मिलती है. गया को भगवान विष्णु की पावन नगरी माना गया है और यहां पिंडदान को पितरों की मुक्ति का बड़ा रास्ता बताया गया है. माना जाता है कि जिन पूर्वजों का पिंडदान गया में होता है, वह दोबारा नहीं भटकती हैं. इसलिए मान्यता है कि गया जाकर विधि-विधान से पिंडदान करने के बाद आत्मा को पूरी तरह मुक्ति और सद्गति मिलती है. इसलिए जिन आत्माओं के अतृप्त रहने या प्रेत योनि में भटकने की मान्यता होती है, उनके लिए गया में पिंडदान को विशेष फलदायी माना गया है.
 

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