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IIT बॉम्बे का अनोखा इनोवेशन, सूखे पत्तों से बना रहे कुकिंग गैस, LPG पर निर्भरता होगी कम

IIT बॉम्बे में कैंपस के पेड़ों से गिरने वाले पत्तों को इकट्ठा कर उन्हें ईंधन में बदला जा रहा है. यह काम बायोमास गैसीफिकेशन तकनीक के जरिए किया जा रहा है. आज IIT बॉम्बे की कैंटीन में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. इससे 30 से 40 प्रतिशत तक LPG की खपत कम हो गई है.

cooking gas made from dried leaves cooking gas made from dried leaves

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनाव का असर पूरी दुनिया पर दिखने लगा है. खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते पर असर पड़ने से तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई है. इसका असर एशिया के कई देशों के साथ भारत पर भी पड़ रहा है. इस चिंता के बीच Indian Institute of Technology Bombay यानी IIT बॉम्बे का एक प्रयोग उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है, जहां सूखे पत्तों से खाना बनाने वाली गैस तैयार की जा रही है.

क्या है यह वेस्ट टू फ्यूल तकनीक?
इस तकनीक की शुरुआत साल 2014 में IIT बॉम्बे के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर Sanjay Mahajani ने की थी. उनका विचार था कि कैंपस में गिरने वाले सूखे पत्तों और टहनियों को फेंकने या जलाने के बजाय उनसे ऊर्जा बनाई जाए. शुरुआत में इस पर काम करना आसान नहीं था, क्योंकि भारतीय बायोमास से क्लिंकर बनते थे, जिससे मशीनें जाम हो जाती थीं और काफी धुआं भी निकलता था.

लगातार रिसर्च के बाद 2016 में टीम ने एक ऐसा गैसीफायर तैयार किया, जिससे क्लिंकर बनने की समस्या 100 गुना तक कम हो गई. इसके बाद इस तकनीक को पेटेंट भी मिला.

कैसे बनती है पत्तों से गैस?
इस प्रक्रिया में सबसे पहले सूखे पत्तों को इकट्ठा किया जाता है और उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर पेलेट (छोटे ठोस टुकड़े) बनाए जाते हैं. फिर इन पेलेट्स को एक खास मशीन में कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में गर्म किया जाता है. इस प्रक्रिया को गैसीफिकेशन कहा जाता है, जिसमें गैस निकलती है. यह गैस साफ जलती है और खाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है. साल 2017 में एनर्जी साइंस विभाग के प्रोफेसर Sandeep Kumar भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े और उन्होंने एक खास बर्नर तैयार किया, जिससे इस गैस का इस्तेमाल आसान हो गया.

 

अब कैंटीन में हो रहा इस्तेमाल
आज IIT बॉम्बे के स्टाफ कैंटीन में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. इससे 30-40% तक LPG की बचत हो रही है. यह सिस्टम करीब 60% तक थर्मल एफिशिएंसी देता है और इससे निकलने वाला धुआं भी बेहद कम (20 ppm से नीचे) है. प्रोफेसर महाजनी के अनुसार, अगर एक और ऐसा सिस्टम लगाया जाए तो रोजाना इस्तेमाल होने वाला LPG सिलेंडर पूरी तरह खत्म किया जा सकता है.

क्या LPG का विकल्प बन सकता है?
फिलहाल यह तकनीक पूरी तरह LPG का विकल्प नहीं है, लेकिन यह एक मजबूत सहायक विकल्प जरूर बन सकती है. खासकर बड़े हॉस्टल, संस्थान और सामुदायिक रसोई में इसका इस्तेमाल LPG पर निर्भरता कम कर सकता है.