cooking gas made from dried leaves
cooking gas made from dried leaves
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनाव का असर पूरी दुनिया पर दिखने लगा है. खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते पर असर पड़ने से तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई है. इसका असर एशिया के कई देशों के साथ भारत पर भी पड़ रहा है. इस चिंता के बीच Indian Institute of Technology Bombay यानी IIT बॉम्बे का एक प्रयोग उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है, जहां सूखे पत्तों से खाना बनाने वाली गैस तैयार की जा रही है.
क्या है यह वेस्ट टू फ्यूल तकनीक?
इस तकनीक की शुरुआत साल 2014 में IIT बॉम्बे के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर Sanjay Mahajani ने की थी. उनका विचार था कि कैंपस में गिरने वाले सूखे पत्तों और टहनियों को फेंकने या जलाने के बजाय उनसे ऊर्जा बनाई जाए. शुरुआत में इस पर काम करना आसान नहीं था, क्योंकि भारतीय बायोमास से क्लिंकर बनते थे, जिससे मशीनें जाम हो जाती थीं और काफी धुआं भी निकलता था.
लगातार रिसर्च के बाद 2016 में टीम ने एक ऐसा गैसीफायर तैयार किया, जिससे क्लिंकर बनने की समस्या 100 गुना तक कम हो गई. इसके बाद इस तकनीक को पेटेंट भी मिला.
कैसे बनती है पत्तों से गैस?
इस प्रक्रिया में सबसे पहले सूखे पत्तों को इकट्ठा किया जाता है और उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर पेलेट (छोटे ठोस टुकड़े) बनाए जाते हैं. फिर इन पेलेट्स को एक खास मशीन में कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में गर्म किया जाता है. इस प्रक्रिया को गैसीफिकेशन कहा जाता है, जिसमें गैस निकलती है. यह गैस साफ जलती है और खाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है. साल 2017 में एनर्जी साइंस विभाग के प्रोफेसर Sandeep Kumar भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े और उन्होंने एक खास बर्नर तैयार किया, जिससे इस गैस का इस्तेमाल आसान हो गया.
#WATCH | Mumbai, Maharashtra: The Indian Institute of Technology (IIT) Bombay has developed an indigenous technology to combat the rising prices and potential shortages of LPG (cooking gas). Through its patented biomass gasification technology, the institute has successfully… pic.twitter.com/rVVIFDrKGV
— ANI (@ANI) March 31, 2026
अब कैंटीन में हो रहा इस्तेमाल
आज IIT बॉम्बे के स्टाफ कैंटीन में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. इससे 30-40% तक LPG की बचत हो रही है. यह सिस्टम करीब 60% तक थर्मल एफिशिएंसी देता है और इससे निकलने वाला धुआं भी बेहद कम (20 ppm से नीचे) है. प्रोफेसर महाजनी के अनुसार, अगर एक और ऐसा सिस्टम लगाया जाए तो रोजाना इस्तेमाल होने वाला LPG सिलेंडर पूरी तरह खत्म किया जा सकता है.
क्या LPG का विकल्प बन सकता है?
फिलहाल यह तकनीक पूरी तरह LPG का विकल्प नहीं है, लेकिन यह एक मजबूत सहायक विकल्प जरूर बन सकती है. खासकर बड़े हॉस्टल, संस्थान और सामुदायिक रसोई में इसका इस्तेमाल LPG पर निर्भरता कम कर सकता है.