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Human Psycholohy: कहानी पसंद न आने पर भी... लोग पूरी करते हैं किताब, जानें ऐसा क्या खास है उनमें... साइकोलॉजी बताती है उनके दिमाग को

किसी किताब को बगैर रुचि के पूरा पढ़ना किसी मुश्किल काम से कम नहीं है. वजह है कि लोग किताब को अधूरा छोड़ देने हैं जब उन्हें कहानी अच्छी न लगे. लेकिन कुछ ऐसे भी है, जो जब तक किताब को पूरा नहीं कर लेते, उन्हें सुकून नहीं मिलता. लेकिन ऐसा है जो उन्हें हर किताब को पूरा करने के लिए मजबूर करते है.

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Person Reading Book (AI) Person Reading Book (AI)

अक्सर कुछ लोगों के साथ होता है कि जब वह किसी किताब को पढ़ते हैं, और किताब के बीच तक पहुंचते हुए कहानी पसंद नहीं आती, तो वह उसे अधूरी छोड़ देते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो कहानी न पसंद आने पर भी किताब को पूरा पढ़ कर ही मानते हैं. ऐसे में सवाल है कि जब आखिर कोई चीज दिलचस्प लग ही नहीं रही, तो उसे आगे तक और क्यों खींचना? अगर आपके साथ भी ऐसा होता है कि आप हर किताब को पूरा पढ़ते हैं, तो साइकोलॉजी आपके बारे में काफी कुछ कहती है. यह दरअसल आपके दिमाग के काम करने के तरीके को बताती है.

अधूरी कहानी दिमाग को करती है परेशान

जब हम कोई कहानी पढ़ते हैं तो हमारा दिमाग उसके किरदारों, घटनाओं और आगे क्या होने वाला है जैसी पहलुओं के साथ जुड़ जाता है, और इन सवालों का जवाब खोजना चाहता है. ऐसे में अचानक किताब को अधूरा छोड़ना थोड़ा अजीब लग सकता है.

साइकोलॉजी में अधूरे काम और उन्हें पूरा करने की इच्छा को लेकर कई बातें सामने आई हैं. इसे अक्सर Zeigarnik Effect से जोड़ा जाता है. यह इफेक्ट पूरे किए गए कामों की तुलना में उन कामों को ज्यादा याद रखता है, जो अधूरे छोड़े गए हैं. इस वजह से साइकोलॉजी कहती है कि इस इफेक्ट के चलते कुछ लोग काम को अधूरा नहीं छोड़ते.

चैप्टर पूरा करके ही क्यों मानता है दिमाग?

किताब का एक चैप्टर आमतौर पर एक छोटी कहानी की तरह बना होता है. उसमें शुरुआत होती है, बीच में घटनाएं आगे बढ़ती हैं और आखिर में किसी हिस्से को पूरा किया जाता है. इसलिए जब रीडर चैप्टर के आखिरी पन्नों तक पहुंच जाता है तो दिमाग को लगता है कि मंजिल बहुत पास है.

यही वजह है कि दो-तीन पन्ने बाकी होने पर किताब अधूरी छोड़ना मुश्किल लग सकता है. मन कहता है कि थोड़ा और पढ़ लेते हैं, फिर पूरा करके आराम करेंगे.

इमोशनल टच नहीं आने देता बाहर

कभी-कभी पढ़ते समय हम कहानी में इतने खो जाते हैं कि समय का पता ही नहीं चलता. हम कैरेक्टरों के बारे में सोचने लगते हैं, आगे होने वाली घटनाओं का अंदाजा लगाते हैं और कहानी के साथ इमोशनली जुड़ जाते हैं.

ऐसी स्थिति में बीच में रुकना कहानी से अचानक बाहर आने जैसा महसूस हो सकता है. इसलिए रीडर बुक को पूरा करके ही मानता है, क्योंकि वह कहीं न कहीं उनके साथ एक इमोशनल टच बना चुका होता है.

क्या यह है परफेक्शनिस्ट होने की निशानी?

हर बार किताब पूरा करके किताब बंद करने का मतलब यह नहीं कि आप परफेक्शनिस्ट हैं. इसके पीछे पढ़ने की आदत, कहानी में इंटरेस्ट, पूरा करने की इच्छा या अधूरापन पसंद न करना जैसे कई कारण हो सकते हैं.