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क्यों स्ट्रे एनिमल को अपनानते हैं लोग? होता है उनका खुद का भी फायदा... जानें साइकोलॉजी के फैक्ट्स

कई लोगों को जानवरों से काफी प्यार होता है, वह उन्हें खाना देते हैं, लेकिन वह आवार जानवरों को घर में जगह नहीं देते हैं. जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जो उन्हें अपने साथ घर ले आते हैं और देखभाल भी करते है. ऐसे में साइकोलॉजी दोनों लोगों के बीच किस प्रकार से फर्क करती है.

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आज भी कई कुत्ते और बिल्लियां बिना शेल्टर के सड़कों पर रहने को मजबूर हैं. उन्हें कुछ लोग सिर्फ खाने के लिए फूड तो दे देते हैं, लेकिन रहने की जगह नहीं. जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उन्हें अपना लेते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसे लोग ऐसा फैसला क्यों लेते हैं? 

दरअसल साइकोलॉजी कहती है कि लोग उन्हें केवल दया भाव के चलते नहीं अपनाते, बल्कि इसके पीछे इंसान का स्वभाव, इमोशन और दूसरों की मदद करने की सोच भी जुड़ी होती है. 

क्या उनमें होती है दया भावना ज्यादा?

साइकोलॉजी के अनुसार जो लोग आवारा जानवरों को अपनाते हैं, वह दूसरों के दर्द को ज्यादा समझते हैं. जब वे किसी घायल, भूखे या डरे हुए जानवर को देखते हैं, तो उसे नजरअंदाज नहीं कर पाते. उन्हें लगता है कि इस जानवर को भी प्यार और सेफ्टी की जरूरत है. यही भावना उन्हें मदद करने के लिए प्रेरित करती है.  

क्यों इंसानों को होता है बेघर जानवरों के लगाव?

सड़क पर रहने वाले जानवर अक्सर डरे हुए और अकेले होते हैं. कई लोगों को उनकी यह हालत दिल से छू जाती है. साइकोलॉजी कहती है कि इंसान ऐसे जीवों से भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर सकता है, जिन्हें सहारे की जरूरत हो. यही जुड़ाव उन्हें जानवर को घर देने का फैसला लेने में मदद करता है.  

भरोसे का रिश्ता है दोनों के लिए अच्छा

जब कोई व्यक्ति किसी आवारा जानवर को घर देता है, तो धीरे-धीरे दोनों के बीच भरोसा बनता है. जानवर सेफ महसूस करने लगता है और इंसान को एक सच्चा साथी मिल जाता है. यह रिश्ता दिखावे, पैसे या पहचान पर नहीं चलता. यह सिर्फ देखभाल और भरोसे पर टिकता है.  

होती है उनमें जिम्मेदारी निभाने की आदत

जानवर को अपनाना सिर्फ उसे घर लाना नहीं है. उसकी रोज देखभाल करना, खाना देना, इलाज कराना और समय देना भी जरूरी होता है. साइकोलॉजी कहती है कि ऐसे लोग जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार रहते हैं. उन्हें किसी जीव की देखभाल करने में खुशी मिलती है.  

पुराने अनुभव भी बनते हैं वजह

जिन लोगों ने पहले कभी पालतू जानवर रखे होते हैं, वे जानवरों के डर, दर्द और जरूरत को जल्दी समझ लेते हैं. इसलिए कई बार वही लोग सड़क के जानवरों को अपनाने का फैसला भी जल्दी लेते हैं. उनके पुराने अनुभव उन्हें मदद करने के लिए प्रेरित करते हैं.  

साइकोलॉजी की कौन सी बातें इसे समझाती हैं?

एक्सपर्ट्स के अनुसार इस व्यवहार को समझाने के लिए दो बातें अहम मानी जाती हैं. पहली है अटैचमेंट थ्योरी, जो बताती है कि देखभाल और भरोसे से गहरा रिश्ता बनता है. दूसरी है एम्पैथी-अल्ट्रूइज़्म थ्योरी, जिसके अनुसार इंसान बिना किसी फायदा सोचे भी किसी जरूरतमंद की मदद कर सकता है.  

कम होता है जीवन का अकेलापन भी

जानवर की देखभाल करने से कई लोगों को मानसिक शांति और अपनापन महसूस होता है. रोज उसे खाना देना, घुमाना और उसके साथ समय बिताना एक अच्छा रूटीन बन जाता है. इससे अकेलापन कम हो सकता है और जीवन में जिम्मेदारी का एहसास बढ़ता है.