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Social Media Reel Scrolling: 2 मिनट से 30 मिनट और फिर 2 घंटे, आखिर क्यों स्क्रोल करते की आदत का कोई अंत नहीं.. जानें क्या विज्ञान?

सोशल मीडिया पर रील देखने का समय कब 2 मिनट से 2 घंटों में बदल जाता है, इसका पता नहीं चलता. इसके पीछे वजह है दिमाग का 'डोपामीन' केमिकल.

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कई बार ऐसा होता है कि आप सिर्फ कुछ मिनट के लिए सोशल मीडिया खोलते हैं, लेकिन देखते ही देखते आधा घंटा, एक घंटा या उससे भी ज्यादा समय निकल जाता है. आज के डिजिटल दौर में ऐसा होना लाखों लोगों के लिए आम बात बन चुका है. चाहे मजेदार वीडियो हों, वायरल मीम्स हों या फिर ताजा खबरें, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यूजर्स ज्यादा से ज्यादा समय तक उनसे जुड़े रहें.

कभी खत्म न होने वाली फीड का असर

किसी किताब की तरह सोशल मीडिया का कोई आखिरी पन्ना नहीं होता और न ही किसी टीवी शो की तरह इसका कोई आखिरी एपिसोड होता है. हर बार स्क्रीन पर स्क्रोल करने पर कुछ नया देखने को मिल सकता है. यही वजह है कि लोग बार-बार स्क्रॉल करते रहते हैं.

हमारा दिमाग नई और दिलचस्प चीजों की तलाश में रहता है. जब हर स्क्रॉल पर कोई मजेदार या चौंकाने वाला कंटेंट मिलता है, तो दिमाग उसे एक इनाम की तरह महसूस करता है और उसी व्यवहार को दोहराने के लिए प्रेरित करता है.

डोपामिन का खेल कैसे काम करता है?

डोपामिन को अक्सर 'फील गुड' केमिकल कहा जाता है, लेकिन इसकी भूमिका सिर्फ खुशी तक सीमित नहीं है. यह हमारे दिमाग में कुछ सीखने और इनाम पाने की इच्छा से जुड़ा होता है. एक्सपर्ट्स सोशल मीडिया की तुलना कई बार स्लॉट मशीन से करते हैं. जैसे स्लॉट मशीन में यह पता नहीं होता कि अगली बार जीत मिलेगी या नहीं, वैसे ही सोशल मीडिया पर भी अगली पोस्ट में क्या मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती. यही कारण है कि कुछ नया मिलने के लिए लोग स्क्रोल करते रहते हैं.

दिमाग को हमेशा चाहिए कुछ नया

हमारा ब्रेन नई जानकारी की तरफ तेज़ी से खिंचता है. सोशल मीडिया हर कुछ सेकंड में नया वीडियो, नई तस्वीर, नई राय या नई खबर दिखाकर इस जिज्ञासा को लगातार बनाए रखता है. कुछ शोध का मानना है कि लंबे समय तक ऐसे तेज और लगातार बदलते कंटेंट को देखने से पढ़ाई, किताबें पढ़ना या किसी काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाने के मुकाबले कठिन लगने लगता है.

एंग्जायटी और स्क्रॉलिंग का खतरनाक खेल

सोशल मीडिया तब और ज्यादा अट्रैक्टिव बन जाता है जब कंटेंट हमारे इमोशन के जुड़ा हुआ हो. खासकर चिंता, डर या तनाव से जुड़ी खबरें लोगों को लगातार अपडेट चेक करने के लिए प्रेरित करती हैं. लेकिन बार-बार ऐसे कंटेंट देखने से तनाव कम होने के बजाय बढ़ सकता है. यही वजह है कि कई लोग चिंता दूर करने के लिए स्क्रॉलिंग शुरू करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वही आदत तनाव और मानसिक थकान को बढ़ाने लगती है.