दशहरे के पावन अवसर पर देशभर में रावण के पुतले का दहन किया जाता है. कंस, महिषासुर और हिरण्यकश्यपु जैसे आतताइयों के बावजूद केवल रावण दहन की ही परंपरा स्थापित है. रावण महाज्ञानी, प्रकांड विद्वान, ज्योतिषाचार्य, आयुर्वेद का जानकार और नीतिज्ञ था. रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापना के दौरान भी रावण ने ही पुरोहित की भूमिका निभाकर भगवान राम को विजय का आशीर्वाद दिया था. विभीषण की सलाह पर उसने राजदूत की मर्यादा का पालन करते हुए हनुमान जी का वध नहीं किया था. इसके बावजूद रावण के भीतर मौजूद अहंकार और राक्षसी वृत्ति उसके सारे गुणों पर भारी पड़ गई. खर-दूषण के वध के बाद रावण जान गया था कि राम साक्षात परमेश्वर हैं और उसने मोक्ष पाने के उद्देश्य से प्रभु से वैर ठाना. रावण दहन समाज को यह बड़ा संदेश देता है कि विद्या और पराक्रम के बाद भी यदि व्यक्ति में अहंकार आ जाए तो विनाश तय है.