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Jagannath Rath Yatra का अंतिम पड़ाव, सोना वेश के बाद हुआ अधर पाना अनुष्ठान, जानें राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडिचा से जुड़ी पूरी कथा

ओडिशा के पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ देव, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की वार्षिक रथयात्रा अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. सोना वेश शृंगार के बाद आषाढ़ शुक्ल द्वादशी को तीनों रथों पर विशेष अधर पाना अनुष्ठान संपन्न हुआ. इस रस्म में दूध, छेना, चीनी, केला, जायफल और कपूर जैसे नौ पदार्थों से बने विशेष मीठे पेय को मिट्टी के विशाल पात्रों में भरकर भगवान के अधरों तक अर्पित किया जाता है और फिर पात्रों को तोड़ दिया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रसाद रथों पर मौजूद सूक्ष्म जीव आत्माओं और अदृश्य शक्तियों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अर्पित किया जाता है. इसके बाद सोमवार को नीलाद्री बीजे की परंपरा निभाई जाएगी, जिसमें भगवान अपनी रूठी पत्नी देवी लक्ष्मी को रसगुल्ला खिलाकर मनाएंगे और श्रीमंदिर के गर्भगृह में लौटेंगे. पौराणिक कथाओं के अनुसार सतयुग में उज्जैन के राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडिचा के समय देव शिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान की इन प्रतिमाओं का निर्माण किया था.