देशभर में गणेशोत्सव की तैयारियां धूमधाम से चल रही हैं और पंडाल सज चुके हैं. सनातन संस्कृति में अनादिकाल से ही भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है. किसी भी शुभ कार्य, विवाह या यज्ञ अनुष्ठान में सबसे पहले गणपति का आह्वान अनिवार्य होता है. रामचरितमानस के अनुसार शिव-पार्वती विवाह में भी मुनियों की आज्ञा से गणेश जी की पूजा की गई थी, क्योंकि वे अनादि देव हैं. इसके अलावा आध्यात्मिक दृष्टि से मानव शरीर में स्थित सात चक्रों में प्रथम मूलाधार चक्र के स्वामी भगवान गणेश हैं. कुंडलिनी जागरण और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मूलाधार चक्र की जागृति आवश्यक मानी जाती है. साथ ही सृष्टि के मूल प्रणव तत्व यानी ओंकार का स्वरूप भी भगवान गणेश के स्वरूप से मेल खाता है. गणेश जी का स्वरूप बुद्धि, विवेक, संयम और अहंकार से मुक्ति का संदेश देता है.